टनल बोरिंग मशीनों की असेंबली शुरू
मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के सबसे चुनौतीपूर्ण अंडरग्राउंड सेक्शन के लिए टनल बोरिंग मशीनों (TBMs) को असेंबल करना शुरू कर दिया गया है। हालांकि एडवांस्ड जर्मन मशीनों के साथ काम शुरू होना प्रगति का संकेत है, लेकिन इसने प्रोजेक्ट की बढ़ती लागत और लंबे समय को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) ने बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) को शिलफाटा से जोड़ने वाले 21 किलोमीटर के अंडरग्राउंड टनल के लिए दो बड़ी टनल बोरिंग मशीनों (TBMs) को असेंबल करना शुरू कर दिया है। यह सेक्शन पूरे 508 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर का सबसे टेक्निकल रूप से कठिन हिस्सा है। इसके तहत घनी आबादी वाले इलाकों और 7 किलोमीटर लंबे थाणे क्रीक के नीचे से खुदाई की जानी है। हर TBM को असेंबल करने में कम से कम 97 दिन लगेंगे।
बढ़ती लागत और लगातार हो रही देरी
शुरुआत में 2023-24 तक पूरा होने की योजना वाला यह प्रोजेक्ट अब 83% बढ़कर लगभग ₹1.98 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। इसकी मुख्य वजहें हैं - ज़मीन अधिग्रहण में हुई भारी देरी और इंफ्रास्ट्रक्चर के सामान की बढ़ती कीमतें। MAHSR कॉरिडोर को महाराष्ट्र में खास तौर पर लैंड एक्विजिशन इश्यूज का सामना करना पड़ा है। ग्लोबल सप्लाई चेन में आई दिक्कतों, खासकर पश्चिम एशिया की घटनाओं के कारण बिटुमेन, स्टील और फ्यूल जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर इनपुट कॉस्ट 15-25% तक बढ़ गई हैं। हेरेनक्नेक्ट (Herrenknecht) जैसी एडवांस्ड TBMs जटिल जियोलॉजी के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन इनके ट्रांसपोर्ट और असेंबली में भी काफी दिक्कतें आती हैं। चीन के कस्टम में फंसी मशीनों जैसे पिछले मामले बताते हैं कि सप्लाई चेन कैसे भारतीय प्रोजेक्ट्स को प्रभावित कर सकती है। भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में खराब ग्राउंड स्टडीज, कॉन्ट्रैक्टिंग मेथड्स और रेगुलेटरी हर्डल्स के कारण 20% से ज़्यादा कॉस्ट ओवररन और महत्वपूर्ण देरी होना आम बात है।
जोखिम: सेफ्टी, डेट और ओवररन
मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल के अंडरग्राउंड सेक्शन की जटिलता, कॉस्ट में बड़ी बढ़ोतरी और आगे और देरी का हाई रिस्क पैदा करती है। TBM असेंबली तो सिर्फ पहला कदम है, इसके बाद मुश्किल खुदाई का काम शुरू होगा। भारत में टनलिंग प्रोजेक्ट्स में ग्राउंड और मिट्टी की स्थितियों का खराब अध्ययन एक आम समस्या है, जिससे देरी और लागत बढ़ती है। प्रोजेक्ट में सेफ्टी इश्यूज की खबरें भी आई हैं, जैसे गुजरात के आनंद में हुआ स्ट्रक्चरल कोलैप्स, जिसमें 3 मज़दूरों की मौत हो गई थी। NHSRCL और आईआईटी (IIT) के एक्सपर्ट इस मामले की जांच कर रहे हैं। प्रोजेक्ट के बढ़ते डेट (कर्ज) और हाई ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस को देखते हुए इसकी लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल हेल्थ पर भी सवाल उठ रहे हैं। चीन ने भले ही बड़े पैमाने पर हाई-स्पीड रेल नेटवर्क बनाया हो, लेकिन उसके अनुभव भी संभावित डेट ट्रैप और आर्थिक समझदारी से ज़्यादा महत्वाकांक्षा पर ज़ोर देने की ओर इशारा करते हैं, और कई रूट्स के घाटे में चलने की खबरें हैं। NHSRCL का FY25 रेवेन्यू जहाँ ₹117 करोड़ था, वहीं ऑथराइज्ड कैपिटल ₹20,000 करोड़ और पेड-अप कैपिटल ₹15,006 करोड़ है, जो फंडिंग की भारी ज़रूरत दिखाता है।
रिवाइज्ड टाइमलाइन्स और भविष्य का अनुमान
TBM असेंबली शुरू होने के बावजूद, अब पूरे 508 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर के 2029 के अंत तक खुलने की उम्मीद है। पहले चरण में, सूरत और बिलिमोरा के बीच का सेक्शन 15 अगस्त, 2027 को खुलने की योजना है। हालांकि, BKC-शिलफाटा सेक्शन की महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग चुनौतियां, बढ़ती लागत और संभावित अनजानी जियोलॉजिकल समस्याएं ये बता रही हैं कि ये तारीखें फिर से बदल सकती हैं। प्रोजेक्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह अपने अनुमानित ₹2 लाख करोड़ की लागत को कैसे मैनेज करता है और अपडेटेड शेड्यूल को पूरा कर पाता है या नहीं।