केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने हाल ही में ब्रह्मपुत्र नदी पर नेशनल वाटरवे-2 (NW-2) के साथ तीन महत्वपूर्ण इनलैंड वाटरवे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन किया। इनमें बोगीबील और धुबरी में कस्टम्स और इमिग्रेशन कॉम्प्लेक्स, और डिब्रूगढ़ में भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) की नवीनीकृत हेरिटेज बिल्डिंग का शुभारंभ शामिल है। ये पहलें पूर्वोत्तर भारत में व्यापार, लॉजिस्टिक्स और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ब्रह्मपुत्र को एक महत्वपूर्ण आर्थिक धमनी में बदलने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं।
आर्थिक लाभ: लागत में कमी और ऐतिहासिक महत्व की वापसी
इनलैंड वाटरवेज़ (Inland Waterways) का आर्थिक फायदा काफी बड़ा है। वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक, रेल (लगभग 2 सेंट प्रति किलोमीटर प्रति टन) और सड़क (लगभग 3 सेंट प्रति किलोमीटर प्रति टन) की तुलना में पानी से माल ढुलाई की लागत लगभग 1 सेंट प्रति किलोमीटर प्रति टन आती है। यह भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां वर्तमान में लॉजिस्टिक्स लागत (Logistics Costs) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 7.97% है। ऐतिहासिक रूप से, ब्रह्मपुत्र एक प्रमुख व्यापार मार्ग रहा है, लेकिन दशकों के निवेश की कमी के कारण इसकी क्षमता का बहुत कम उपयोग हो रहा था, जिससे क्षेत्र की कुल लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ रही थी। नई शुरू की गई सुविधाएँ, जैसे जलमार्ग का रखरखाव और ड्रेजिंग (dredging), इस भूमिका को फिर से हासिल करने का लक्ष्य रखती हैं। नेशनल वाटरवे-2 को पूर्वोत्तर के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जो NW-16 (बराक नदी) के साथ मिलकर माल की आवाजाही को सुगम बनाएगा। सरकारी अनुमानों के अनुसार, मार्च 2026 तक माल की मात्रा में भारी वृद्धि होकर 156 मिलियन टन तक पहुँचने की उम्मीद है, और 2030 तक इसमें और भी अधिक बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
भू-राजनीतिक द्वार: पूर्वोत्तर-एशिया व्यापार को बढ़ावा
ब्रह्मपुत्र जलमार्ग का रणनीतिक विकास भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसका उद्देश्य बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाना है। बोगीबील और धुबरी में कस्टम्स और इमिग्रेशन सुविधाओं के उद्घाटन से विशेष रूप से सीमा पार वाणिज्य को बढ़ावा मिलेगा। धुबरी अब बांग्लादेश और भूटान के साथ व्यापार के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित हो गया है। ब्रह्मपुत्र और संबंधित इंडो-बांग्लादेश प्रोटोकॉल (IBP) मार्ग, संकरे सिलिगुड़ी कॉरिडोर (Siliguri Corridor) के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करते हैं, जिससे यात्रा की दूरी कम होती है और भूमि-आधारित परिवहन पर निर्भरता घटती है। 2018-19 में, भारत ने इन प्रोटोकॉल मार्गों के माध्यम से बांग्लादेश को लगभग 2.4 मिलियन टन कार्गो का निर्यात किया, जिसमें मुख्य रूप से फ्लाई ऐश (fly ash) और स्टील शामिल थे। IBP मार्गों में हालिया बदलावों से कनेक्टिविटी और भी बढ़ी है।
चुनौतियाँ: नौगम्यता की बाधाएं और कार्यान्वयन में कमी
महत्वपूर्ण निवेश और रणनीतिक इरादे के बावजूद, इनलैंड वाटरवे की पूरी क्षमता को साकार करने में बड़ी चुनौतियाँ हैं। मौसमी जल स्तर में उतार-चढ़ाव, गाद जमना (siltation), और चैनल की गहराई अपर्याप्त होना, विशेष रूप से शुष्क महीनों के दौरान, नौगम्यता (navigability) में अक्सर बाधा डालते हैं। बुनियादी ढाँचा, हालांकि सुधर रहा है, फिर भी अपर्याप्त पोर्ट सुविधाओं (port facilities) और आधुनिक टर्मिनलों (terminals) व नौवहन सहायकों (navigational aids) की कमी से जूझ रहा है। प्रति टन प्रति किलोमीटर (PTPK) की लागत इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट के लिए ₹3.30 तक हो सकती है, जो रेल (₹1.96) और तटीय शिपिंग (₹1.80) से अधिक है, हालांकि यह सड़क परिवहन (₹3.78) से सस्ती है। यह अंतर मात्रा की कमी और बुनियादी ढांचे की खामियों के कारण है। ऐतिहासिक रूप से, दशकों तक निवेश न होने के कारण जलमार्ग परिवहन भारत के कुल माल यातायात का केवल 0.5% था। निजी क्षेत्र ने आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) संबंधी चिंताओं के कारण ऐतिहासिक रूप से 'उदासीन प्रतिक्रिया' दिखाई है, जिससे सुविधाओं के रखरखाव और क्षमता विस्तार पर असर पड़ा है।
भविष्य की राह: कनेक्टिविटी का विस्तार
सरकार ने अगले पांच वर्षों में पूर्वोत्तर क्षेत्र में इनलैंड वाटरवे विकास के लिए ₹5,000 करोड़ की एक महत्वाकांक्षी योजना की रूपरेखा तैयार की है। 2016 के अधिनियम के तहत घोषित 111 राष्ट्रीय जलमार्गों के साथ, रणनीति नौगम्यता बढ़ाने, मल्टीमॉडल परिवहन (multimodal transport) को एकीकृत करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। NW-2 और NW-16 के सफल विकास से पेट्रोलियम उत्पादों और औद्योगिक कार्गो जैसे थोक वस्तुओं (bulk commodities) के लिए लॉजिस्टिक्स लागत में काफी कमी आने की उम्मीद है। कार्गो के अलावा, ये जलमार्ग यात्री आवाजाही (passenger movement) और पर्यटन के लिए भी क्षमता रखते हैं, जिससे पूर्वोत्तर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नेटवर्क में और अधिक एकीकृत किया जा सकेगा।