शिपिंग रूट में बदलाव से बढ़ी व्यापार की लागत
Bab el-Mandeb Strait और लाल सागर (Red Sea) क्षेत्र में बढ़ते सुरक्षा खतरों ने दुनिया भर के व्यापार को प्रभावित किया है। इस कारण प्रमुख शिपिंग कंपनियों जैसे Maersk, Hapag-Lloyd और CMA CGM ने अपने जहाजों को लाल सागर से न गुजारने का फैसला किया है। इसके बजाय, उन्हें एशिया और यूरोप के बीच यात्रा के लिए केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) का चक्कर लगाना पड़ रहा है।
इस बदलाव से यात्रा में 10 से 15 दिन अतिरिक्त लग रहे हैं। इससे अधिक ईंधन की खपत, मजदूरों का बढ़ता खर्च और शिपिंग बेड़े की क्षमता में कमी आ रही है। नतीजतन, प्रभावित मार्गों पर फ्रेट रेट्स (freight rates) में 30% से 50% तक की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। इसके अलावा, जहाज मालिक अतिरिक्त सरचार्ज (surcharges) भी लगा रहे हैं, जिससे शिपर्स और अंततः उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ रहा है। ये बढ़ी हुई लागतें सीधे तौर पर वैश्विक महंगाई को हवा दे रही हैं, जो ऊर्जा, निर्मित सामान, कच्चे माल और खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित कर रही हैं।
भारत पर पड़ रहा है बड़ा असर
भारत के लिए Bab el-Mandeb Strait का यह व्यवधान खास तौर पर चिंताजनक है, क्योंकि हम यूरोप, उत्तरी अमेरिका और मध्य पूर्व के साथ व्यापार के लिए इस मार्ग पर बहुत अधिक निर्भर हैं। अब भारत से पश्चिमी देशों के लगभग 95% कार्गो को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) के रास्ते भेजा जा रहा है।
इसके चलते आयात और निर्यात में 21 से 28 दिनों तक की देरी हो रही है। कच्चे तेल, उर्वरकों और निर्मित सामान जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की डिलीवरी धीमी पड़ गई है, जिसका सीधा असर घरेलू ईंधन की कीमतों और निर्माण लागतों पर पड़ रहा है। लंबी ट्रांजिट टाइम (transit times) और ऊंचे फ्रेट रेट्स (freight rates) भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता (export competitiveness) को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। भैंस के मांस और चाय जैसे निर्यात पर भारी नुकसान की आशंका है। वहीं, सूरजमुखी तेल और उर्वरकों जैसे आवश्यक आयात की कीमतों में बढ़ोतरी और संभावित कमी का डर बढ़ रहा है। सरकार द्वारा ईंधन पर टैक्स कम करने जैसे कदम, शिपिंग लागत में वृद्धि से उत्पन्न प्रत्यक्ष महंगाई के खतरे को दर्शाते हैं।
सप्लाई चेन पर दबाव और गिरता आर्थिक परिदृश्य
Bab el-Mandeb Strait के पास जारी अस्थिरता ने सप्लाई चेन (supply chain) को और कमजोर कर दिया है और लागतें बढ़ा दी हैं, जिससे वैश्विक आर्थिक परिदृश्य (economic outlook) पर खतरा मंडरा रहा है। जहाजों के लिए केप ऑफ गुड होप का रास्ता महंगा होने के साथ-साथ अधिक शिपिंग क्षमता का उपयोग कर रहा है। अतिरिक्त ट्रांजिट दिनों का मतलब है कि जहाजों की सालाना यात्राएं कम हो रही हैं, जिससे शिपिंग क्षमता में 10% से 15% तक की कमी आ सकती है और प्रति कंटेनर लागत बढ़ सकती है।
इन रूट बदलावों और सरचार्ज (surcharges) के कारण वैश्विक व्यापार की लागत में लगातार बढ़ोतरी हो सकती है, जो आर्थिक गतिविधियों को धीमा कर सकती है और महंगाई को और बढ़ा सकती है। यह व्यवधान महत्वपूर्ण व्यापार मात्रा को प्रभावित करता है: दुनिया के लगभग 10-12% तेल और गैस तथा लगभग 12% वैश्विक व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यह मार्ग पूरी तरह से बंद हो जाए, तो वैश्विक समुद्री ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। दुनिया भर के लॉजिस्टिक्स (logistics) आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए अन्य बंदरगाहों पर जाम लगना भी एक बढ़ी हुई चिंता है, जिससे और अधिक देरी और अप्रत्याशित लागत बढ़ सकती है।
भविष्य का अनुमान: जारी रहेगी बाधाएं और महंगाई का दबाव
विश्लेषकों का अनुमान है कि Bab el-Mandeb Strait में व्यवधान और लाल सागर (Red Sea) का तनाव वैश्विक व्यापार और फ्रेट रेट्स (freight rates) को लंबे समय तक प्रभावित करता रहेगा। हालांकि छुट्टियों की मांग कम होने से कुछ स्पॉट रेट्स (spot rates) में मामूली कमी आई है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम एक बड़ा कारक बना हुआ है। यदि तनाव और बढ़ा या यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो स्वेज नहर (Suez Canal) के माध्यम से मिलने वाली लागत बचत जल्द वापस नहीं आएगी।
ये बढ़ी हुई शिपिंग लागतें उपभोक्ता कीमतों को बढ़ाती रहेंगी, जिससे केंद्रीय बैंकों (central banks) के लिए महंगाई को नियंत्रित करना और मुश्किल हो जाएगा। भारत के लिए, इन चुनौतियों से पता चलता है कि व्यापार मार्गों का विविधीकरण (diversification) करने और एक मुख्य शिपिंग पथ पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू लॉजिस्टिक्स (domestic logistics) को बेहतर बनाने की कितनी आवश्यकता है। बाजार शिपिंग के लिए एक सतर्क दृष्टिकोण की उम्मीद कर रहा है, जिसमें क्षमता को लेकर चिंताएं बनी रहेंगी और सुरक्षा की स्थिति में अचानक बदलाव होने पर दरों में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है।