ग्रीन फ्यूल का सपना क्यों हुआ मुश्किल?
यह स्थिति एविएशन सेक्टर के महत्वाकांक्षी डीकार्बोनाइजेशन रोडमैप के लिए एक बड़ी रुकावट साबित हो रही है। कार्बन उत्सर्जन कम करने में सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) अहम भूमिका निभाता है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कई मुश्किलों से जूझ रहा है।
प्रोडक्शन की कमी और आसमान छूती कीमतें
इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) के डायरेक्टर-जनरल विली वाल्श (Willie Walsh) ने चिंता जताई है कि SAF का प्रोडक्शन काफी कम है। साल 2025 तक इसका ग्लोबल प्रोडक्शन सिर्फ 1.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो कुल जेट फ्यूल की खपत का महज 0.6 प्रतिशत है। यह इंडस्ट्री के पिछले अनुमानों से काफी कम है। प्रोडक्शन की इसी कमी के कारण SAF की कीमत कन्वेंशनल फ्यूल से 2 गुना से भी ज्यादा है, और कुछ जगहों पर यह 4 गुना तक महंगी हो सकती है। इतनी ज्यादा कीमत एयरलाइंस की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) और हवाई किराए को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।
नियम बने दोधारी तलवार
SAF के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए बनाए जा रहे नियम भी एक पेचीदा चुनौती पेश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपियन यूनियन (EU) के नियम इस साल 2% से शुरू होकर 2030 तक SAF ब्लेंडिंग को 6% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं। वाल्श के मुताबिक, इन अनिवार्य नियमों (Mandates) ने अनजाने में कीमतों को और बढ़ा दिया है और एयरलाइंस की वॉलंटरी (स्वैच्छिक) डिमांड को कम कर दिया है, जबकि वे शायद खुद ही निवेश करने को तैयार होतीं।
सिंगापुर का अनोखा तरीका
SAF की बिक्री बढ़ाने के लिए, सिंगापुर ने एक पहल की है। यहां एक वॉलंटरी (स्वैच्छिक) ट्रायल चल रहा है जिसमें गूगल (Google) और टेमासेक (Temasek) जैसी कंपनियां शामिल हैं, जो सेंट्रलाइज्ड SAF प्रोक्योरमेंट (खरीद) पर फोकस कर रही हैं। साथ ही, 1 अक्टूबर 2026 से सिंगापुर से उड़ान भरने वाली सभी फ्लाइट्स में 1% SAF ब्लेंड अनिवार्य कर दिया जाएगा। इस पर होने वाला खर्च एक लेवी (Tax) से वसूला जाएगा, जिससे टिकटों की कीमतें बढ़ने की उम्मीद है। सिंगापुर का लक्ष्य 2030 तक SAF ब्लेंडिंग को 3% से 5% तक बढ़ाने का है।
सिस्टम में बड़ी दिक्कतें
कीमतों और नियमों के अलावा, SAF के रास्ते में और भी बड़ी बाधाएं हैं। SAF प्रोडक्शन की सीमित क्षमता, सस्टेनेबल फीडस्टॉक्स (कच्चे माल) की उपलब्धता और एडवांस रिफाइनिंग टेक्नोलॉजी में भारी निवेश की जरूरत जैसी कई सिस्टमैटिक दिक्कतें सामने हैं। यह SAF की कमी सिर्फ किसी एक कंपनी के लिए नहीं, बल्कि पूरी एविएशन इंडस्ट्री की वैल्यूएशन (Valuation) पर असर डाल रही है, खासकर उन एयरलाइंस के लिए जो ग्रोथ और लॉन्ग-टर्म ESG (Environmental, Social, and Governance) परफॉर्मेंस पर निर्भर हैं। कुल मिलाकर, यह साफ है कि एविएशन को पूरी तरह से सस्टेनेबल बनाने का रास्ता अभी भी बहुत कठिन है और इसके लिए बड़े पैमाने पर इनोवेशन और ग्लोबल कोऑर्डिनेशन (समन्वित प्रयास) की जरूरत होगी।