भारत का एविएशन (Aviation) मार्केट अब काफी हद तक IndiGo और Air India ग्रुप के कंट्रोल में आ गया है। सरकार के एक नियम के चलते एयरपोर्ट ऑपरेटर्स नई एयरलाइन्स में बड़ी हिस्सेदारी नहीं रख सकते। यह रोक नई और दमदार कंपनियों के एंट्री को सीमित करती है। निवेशक इस पर नजर रख रहे हैं कि ये पॉलिसी और भारी ऑपरेटिंग कॉस्ट (Operating Cost) लंबी अवधि में कंपटीशन और टिकट की कीमतों को कैसे प्रभावित करेंगी।
Detailed Coverage
भारत के आसमान पर अब सिर्फ दो दिग्गजों का राज?
भारत का एविएशन सेक्टर रिकॉर्डतोड़ पैसेंजर संख्या देख रहा है, लेकिन इंडस्ट्री में अब कुछ गिने-चुने प्लेयर्स का दबदबा बढ़ गया है। IndiGo और Air India ग्रुप मिलकर डोमेस्टिक मार्केट का बड़ा हिस्सा कंट्रोल करते हैं। यह स्थिति तब बनी है जब Jet Airways और Go First जैसी कई एयरलाइन्स बाजार से बाहर हो गईं। इस कंसॉलिडेशन (Consolidation) के बीच, एक पुरानी पॉलिसी फिर से चर्चा में है – एयरपोर्ट ऑपरेटर्स किसी भी एयरलाइन में 10% से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकते।
मालिकाना हक की सीमाएं: क्यों हैं ये नियम?
मौजूदा पॉलिसी का मकसद मार्केट में सबको बराबर का मौका देना है। चूंकि बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर्स टर्मिनल एक्सेस, पार्किंग और लैंडिंग स्लॉट जैसी जरूरी सुविधाएं कंट्रोल करते हैं, इसलिए यह डर है कि अगर वे खुद की एयरलाइन चलाएंगे तो अपनी फ्लाइट्स को फायदा पहुंचा सकते हैं। इसी तरह के हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकने के लिए, रेगुलेटर्स (Regulators) ने इस तरह की ओनरशिप (Ownership) को सीमित कर दिया है। पॉलिसी मेकर्स के लिए चुनौती यह है कि वे कंपटीशन को बढ़ावा देने और इन सुरक्षा उपायों को बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे बिठाएं।
नई और पुरानी एयरलाइन्स के लिए चुनौतियां
हालांकि मार्केट का साइज बढ़ रहा है, भारत में एयरलाइन चलाना अभी भी एक मुश्किल काम है। एयरलाइन्स को लगातार कम प्रॉफिट मार्जिन, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और फॉरेन करेंसी (Foreign Currency) में एयरक्राफ्ट लीज (Lease) पेमेंट के दबाव का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, भारतीय पैसेंजर कीमत के मामले में काफी सेंसिटिव (Sensitive) होते हैं। इन फैक्टर्स की वजह से छोटी एयरलाइन्स के लिए बड़े पैमाने पर आगे बढ़ना मुश्किल रहा है। कई बार अच्छी फंडिंग वाली कंपनियां भी बड़ी, स्थापित प्लेयर्स से कड़ी प्राइस वॉर (Price War) में टिक नहीं पातीं।
निवेशकों की नजरें कहां?
मौजूदा मार्केट स्ट्रक्चर (Market Structure) के कारण, IndiGo और Air India को नए, बड़े प्रतिद्वंद्वियों से उतना दबाव महसूस नहीं होता, जितना कि शायद ज्यादा खुले रेगुलेटरी माहौल में होता। Akasa Air और SpiceJet जैसी कंपनियां अभी भी कुछ रूट्स पर ऑपरेट कर रही हैं, लेकिन बड़े मार्केट में उनका असर सीमित है। सेक्टर के लिए मुख्य मॉनिटर करने वाली बात यह है कि क्या भविष्य में पॉलिसी अपडेट से निवेश के नए स्ट्रक्चर की इजाजत मिलेगी, या मार्केट लंबे समय तक इन्हीं दो बड़े ग्रुप्स के दबदबे में रहेगा। निवेशक यह भी ट्रैक कर सकते हैं कि ये कंपनियां बढ़ती इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और लगातार लागत के दबाव के बीच अपनी कैपेसिटी (Capacity) बढ़ाने की योजनाओं को कैसे मैनेज करती हैं, जो इस कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर में लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) के लिए अहम हैं।
