India CV Market: FY30 तक 45% गाड़ियां चलेंगी CNG, LNG और बिजली पर!

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AuthorNeha Patil|Published at:
India CV Market: FY30 तक 45% गाड़ियां चलेंगी CNG, LNG और बिजली पर!

ICRA की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2030 तक भारत के कमर्शियल व्हीकल (CV) मार्केट में 45% हिस्सेदारी सीएनजी, एलएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों की होगी। यह हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2026 में 27% रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि अब डीजल का दबदबा कम होगा, क्योंकि एमिशन नॉर्म्स कड़े हो रहे हैं और क्लीनर व्हीकल्स की कुल लागत भी कम हो रही है।

Detailed Coverage

डीजल को टक्कर देंगे CNG, LNG और इलेक्ट्रिक व्हीकल

भारत का कमर्शियल व्हीकल (CV) सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पारंपरिक डीजल इंजनों की जगह अब सीएनजी (CNG), एलएनजी (LNG) और इलेक्ट्रिक (EV) जैसे वैकल्पिक ईंधन तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। रेटिंग एजेंसी ICRA की एक रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 2030 तक, कुल कमर्शियल व्हीकल मार्केट में इन वैकल्पिक ईंधनों पर चलने वाले वाहनों का हिस्सा 40% से 45% तक पहुंच सकता है। यह एक बड़ी छलांग होगी, क्योंकि वित्त वर्ष 2026 में यह हिस्सा सिर्फ 27% रहने का अनुमान है।

डीजल की घटती पकड़

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि डीजल वाहनों की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। जहां वित्त वर्ष 2021 में CV मार्केट में डीजल की हिस्सेदारी 86% थी, वहीं वित्त वर्ष 2026 तक यह घटकर 67% रह जाने की उम्मीद है। इसी दौरान, सीएनजी और एलएनजी की हिस्सेदारी 7% से बढ़कर 25% हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि सीएनजी और एलएनजी की यह रफ्तार आगे भी जारी रहेगी और वित्त वर्ष 2030 तक यह 30% से 35% तक पहुंच सकती है।

इलेक्ट्रिक व्हीकल (EVs) की बड़ी छलांग

फिलहाल इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की हिस्सेदारी कम है, लेकिन आने वाले समय में इसमें तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। ICRA का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2030 तक CVs में EVs का हिस्सा 10% से 15% तक हो सकता है। खासकर बस सेगमेंट में इलेक्ट्रिक तकनीक को तेजी से अपनाया जा रहा है। सरकार की 'पीएम ई-ड्राइव स्कीम' (PM E-Drive Scheme) जैसी पहलों ने इलेक्ट्रिक ट्रकों और बसों की भारी शुरुआती लागत को सब्सिडी के जरिए कम करके इस बदलाव को गति दी है।

मैन्युफैक्चरर्स और ऑपरेटर्स के लिए चुनौतियां

हालांकि, हरित ऊर्जा की ओर यह बदलाव कई चुनौतियों से भरा है। वाहनों की ऊंची कीमत और चार्जिंग व रीफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी जैसी समस्याएं इस बदलाव की रफ्तार पर असर डाल सकती हैं। भारतीय CV मार्केट में 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' (Total Cost of Ownership) बहुत मायने रखता है। ऐसे में, ऑपरेटर्स को वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की कम ईंधन लागत की तुलना में उनकी ऊंची शुरुआती लागत और रेंज की चिंता जैसे मुद्दों पर विचार करना होगा।

निवेशकों के लिए, यह बदलाव ऑटोमोबाइल कंपनियों (OEMs) के लिए एक जटिल परिदृश्य पेश करता है। इंडस्ट्री की वॉल्यूम ग्रोथ बनी रहने की उम्मीद है, लेकिन कंपनियों को नई टेक्नोलॉजीज में भारी निवेश करना होगा। इन कंपनियों की लंबी अवधि की प्रॉफिटेबिलिटी और क्रेडिट क्वालिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इन खर्चों का प्रबंधन कैसे करती हैं और ग्राहकों की बदलती मांग व रेगुलेटरी माहौल के अनुरूप अपने प्रोडक्शन को कैसे ढालती हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपने मौजूदा डीजल बिजनेस और क्लीनर टेक्नोलॉजी में निवेश के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं ताकि वे अपने प्रॉफिट मार्जिन और मार्केट शेयर को बचा सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.