मार्जिन पर सीधा असर
एविएशन इंडस्ट्री (Aviation Industry) IATA की सालाना मीटिंग में चिंताजनक स्थिति के साथ पहुंच रही है। साल 2026 तक $41 बिलियन के भारी मुनाफे का अनुमान अब गलत साबित होता दिख रहा है, जिसकी मुख्य वजह मध्य-पूर्व का मौजूदा संकट है। समस्या सिर्फ जेट फ्यूल की आसमान छूती कीमतों की नहीं, बल्कि मजबूरन बदले गए रूट की वजह से बढ़े खर्चों की भी है। इन बदले हुए रास्तों के कारण फ्लाइट का समय बढ़ रहा है, ज्यादा फ्यूल जल रहा है और इंजन की लाइफ भी कम हो रही है। इन सब का असर कंपनी के खर्चों पर पड़ रहा है, जिसे किराये में की गई मामूली बढ़त से पूरा करना नामुमकिन है। मार्केट के आंकड़े बताते हैं कि भले ही नॉर्थ अमेरिकन एयरलाइंस (North American Airlines) किराये बढ़ाने में कामयाब रही हैं, लेकिन वे भी एक ऐसे पॉइंट पर पहुंच गई हैं जहां से आगे किराया बढ़ाने पर पैसेंजर कम हो सकते हैं।
कमजोरियां और कॉम्पिटिशन में अंतर
'रिवेंज ट्रैवल' (Revenge Travel) के दौर के विपरीत, मौजूदा हालात सप्लाई की कमी से जुड़े हैं। मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) से प्लेन मिलने में देरी के कारण कंपनियां अपने बेड़े का विस्तार नहीं कर पा रही हैं, जबकि इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा फ्यूल-एफिशिएंट (Fuel-efficient) प्लेन की जरूरत है। इस वजह से पुरानी और लो-कॉस्ट एयरलाइंस (Low-cost Airlines) के बीच बड़ा अंतर आ गया है। प्रीमियम एयरलाइंस (Premium Airlines) अपनी कमाई बढ़ाने के लिए एंसिलरी रेवेन्यू (Ancillary Revenue) और बिजनेस क्लास (Business Class) किराये पर निर्भर हैं, लेकिन यह सेगमेंट इकोनॉमिक मंदी के प्रति संवेदनशील है। वहीं, एशियन मार्केट (Asian Market) की लो-कॉस्ट एयरलाइंस दोहरी मार झेल रही हैं - उनके पास किराये बढ़ाने की गुंजाइश कम है, और स्थानीय करेंसी (Local Currency) के कमजोर होने से डॉलर में फ्यूल खरीदना और महंगा हो गया है। पिछले सप्लाई शॉक (Supply Shock) का इतिहास बताता है कि केवल वही एयरलाइंस क्रेडिट रेटिंग के दबाव से बच पाएंगी जिनके पास फ्यूल हेजिंग (Fuel Hedging) का मजबूत इंतजाम और अच्छी लिक्विडिटी (Liquidity) पोजीशन है।
मंदी का बड़ा कारण
इंडस्ट्री अभी छोटी-मोटी बढ़त से अपनी अंदरूनी कमजोरी छिपा रही है। मूडीज (Moody’s) द्वारा सेक्टर आउटलुक (Sector Outlook) को निगेटिव (Negative) करना इस बात का संकेत है कि एयरलाइंस मार्जिन में लगातार कमी के दौर में प्रवेश कर रही हैं, जो मौजूदा संकट के बाद भी जारी रह सकती है। मैनेजमेंट के पास बहुत कम विकल्प बचे हैं, खासकर जो पहले से ही इंजन की दिक्कतें और लेबर स्ट्राइक (Labor Strike) से जूझ रहे हैं। 2050 तक नेट-जीरो (Net-zero) टारगेट को पूरा करना एक बड़ा फाइनेंशियल बोझ बनता जा रहा है, क्योंकि सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (Sustainable Aviation Fuel - SAF) की कीमत ऊंचे इंटरेस्ट रेट (Interest Rate) के माहौल में बहुत ज्यादा है। जिन कंपनियों ने लंबे समय के लिए फ्यूल हेजिंग नहीं की है या जिनके ऊपर कोविड-19 के दौरान भारी कर्ज चढ़ गया था, वे अगर पीक हॉलिडे सीजन (Peak Holiday Quarter) तक एयरस्पेस की दिक्कतें जारी रहीं तो दिवालिया होने के कगार पर पहुंच सकती हैं।
आगे का रास्ता
मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) को कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) में कटौती की खबरों पर नजर रखनी चाहिए। अगर एग्जीक्यूटिव्स (Executives) अपनी बैलेंस शीट (Balance Sheet) बचाने के लिए बेड़े के आधुनिकीकरण (Fleet Modernization) की योजनाओं को छोड़ने का संकेत देते हैं, तो इससे सप्लाई में कमी आएगी। भले ही इससे टिकट की कीमतें बढ़ें, लेकिन इंडस्ट्री की ग्रोथ की गुंजाइश हमेशा के लिए कम हो जाएगी। अब सवाल यह है कि कौन सी एयरलाइंस अपनी कमाई (Yield Growth) और खर्च (Unit Cost Inflation) के बीच का अंतर बनाए रख पाती हैं, जो कि दुनिया के ज्यादातर बड़े इलाकों में तेजी से गिर रहा है।
