त्योहारी सीजन में घरेलू हवाई सफर महंगा हो गया है। कुछ रूटों पर तो किराए में **340%** तक का उछाल आया है, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है। एयरलाइन्स इसे कम कैपेसिटी और बढ़ती फ्यूल कॉस्ट का नतीजा बता रही हैं।
फेस्टिव सीजन की डिमांड ने हवाई किराए में आग लगा दी है। कोलकाता-देवघर, मुंबई-बरेली और बेंगलुरु-झारसुगुड़ा जैसे कम कॉम्पिटिशन वाले रूटों पर टिकट के दाम 340% तक बढ़ गए हैं। वहीं, दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-बेंगलुरु जैसे व्यस्त रूटों पर स्थिति थोड़ी बेहतर है, जहां किराए में सिर्फ 15% की ही बढ़ोतरी देखी गई है क्योंकि यहां एयरलाइन्स के बीच कॉम्पिटिशन ज्यादा है।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और रेगुलेटरी रिस्क
इस बेतहाशा बढ़ोतरी पर अब सुप्रीम कोर्ट की नजर है। कोर्ट में एक पीआईएल (PIL) पर सुनवाई हो रही है, जिसमें एयरलाइन्स की प्राइसिंग को 'एक्स्प्लोइटेटिव' (शोषणकारी) बताया गया है। केंद्र सरकार अब 'भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024' (Bharatiya Vayuyan Adhiniyam, 2024) के तहत नए नियम लागू करने की तैयारी में है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क यह है कि क्या सरकार डायनेमिक प्राइसिंग पर कोई 'प्राइस कैप' लगा सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो एयरलाइन्स की कमाई और नेट प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
कैपेसिटी और ऑपरेटिंग कॉस्ट का दबाव
सितंबर 2026 तक देश की कुल सीट कैपेसिटी में 5.6% की गिरावट आई है। इंडिगो (IndiGo) जैसी बड़ी एयरलाइन ने भी फ्लीट और मेंटेनेंस दिक्कतों के चलते अपनी कैपेसिटी में 4.5% की कटौती की है। इसके अलावा, एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) का खर्च एयरलाइन्स की कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट का 30% से 40% होता है, जो मुनाफे पर लगाम लगा रहा है।
हालांकि, पूरे सेक्टर का घाटा कम होता दिख रहा है, जो FY2026 के ₹170-180 अरब से घटकर FY2027 में ₹110-120 अरब रहने का अनुमान है। इंटरग्लोब एविएशन (InterGlobe Aviation) का स्टॉक फिलहाल ₹5,000 के आसपास ट्रेड कर रहा है। बाजार की नजरें अब सरकार के उन नए नियमों पर टिकी हैं, जो एयरलाइन्स की मनमानी कीमतों पर लगाम लगा सकते हैं।
