प्रीमियम सफर में सप्लाई चेन का रोड़ा
एयर इंडिया अपने पैसेंजर्स के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए अपनी फ्लीट को मॉडर्नाइज करने और प्रीमियम सर्विसेज को बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसके तहत कंपनी $400 मिलियन खर्च कर रही है ताकि पुराने प्लेन्स को अपग्रेड किया जा सके और नए केबिन स्टैंडर्ड्स लाए जा सकें। इसका मकसद प्रीमियम ट्रैवल मार्केट से ज्यादा रेवेन्यू कमाना है, जो पिछले साल 11.8% बढ़ा था। सीईओ कैम्पबेल विल्सन भले ही इन प्लान्स को लेकर उम्मीदें जता रहे हों, लेकिन ग्लोबल सप्लाई चेन में आ रही दिक्कतें और मौजूदा फ्लीट में बार-बार होने वाली खराबी की चिंताजनक दर इन जरूरी अपग्रेड्स और नए प्लेन की डिलीवरी में काफी देरी कर रही है।
कहां जा रहा है एयर इंडिया का प्रीमियम प्लान?
एयर इंडिया अपनी फ्लीट में नए प्लेन जैसे बोइंग 787 ड्रीमलाइनर शामिल कर रही है और पुराने बोइंग 777 जैसे प्लेन्स के केबिन को भी नया रूप दे रही है। कंपनी चुनिंदा जगहों पर शानदार एयरपोर्ट लाउंज भी खोल रही है और ड्रीमलाइनर पर फर्स्ट-क्लास केबिन लाने की भी योजना है। सीईओ विल्सन का कहना है कि साल के अंत तक वाइड-बॉडी फ्लीट का आधा हिस्सा नए स्टैंडर्ड्स पर होगा, और पूरी फ्लीट को अपग्रेड करने में 18-24 महीने लगेंगे। बिजनेस और फर्स्ट-क्लास पर यह फोकस रेवेन्यू बढ़ाने के लिए है, क्योंकि ये सेगमेंट एयरलाइंस के लिए सबसे ज्यादा कमाई का जरिया होते हैं। दुबई, न्यूयॉर्क और लंदन जैसे रूट्स पर इसका शुरुआती असर दिखना भी शुरू हो गया है।
भारतीय एविएशन मार्केट का नज़रिया
भारतीय एविएशन मार्केट तेजी से बढ़ रहा है और 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मार्केट बनने की उम्मीद है। 2025 में इसकी वैल्यू $14.78 बिलियन थी, जो 2031 तक बढ़कर $28.96 बिलियन होने का अनुमान है। इस रफ्तार भरे माहौल में, एयर इंडिया अपनी बढ़ी हुई क्षमता और प्रीमियम ऑफर्स का फायदा उठाना चाहती है। फिलहाल, एयर इंडिया ग्रुप का मार्केट शेयर 26.8% है, जो इंडिगो के 64.4% से काफी कम है। इंडिगो ने फाइनेंशियल ईयर 25 में ₹7,587.50 करोड़ का प्रॉफिट दर्ज किया था और उसका P/E रेश्यो करीब 41.7 है। वहीं, एयर इंडिया का फाइनेंशियल ईयर 25 का रेवेन्यू ₹78,000 करोड़ से ज्यादा रहा, लेकिन मर्ज एंटिटी के लिए नुकसान बढ़कर करीब ₹11,000 करोड़ हो गया। टाटा ग्रुप के सपोर्ट के कारण एयर इंडिया की बैंक फैसिलिटीज पर 'CRISIL AAA/Stable/CRISIL A1+' रेटिंग है, जो मजबूत फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी दिखाती है। हालांकि, कंपनी को बढ़ते फ्यूल कॉस्ट और करेंसी में गिरावट जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अगले 8-10 सालों में 470 नए प्लेन का ऑर्डर एयर इंडिया की मल्टी-बिलियन डॉलर की योजना का हिस्सा है, जिससे नियर-टर्म में नेट डेट और लीज लायबिलिटी बढ़ेगी।
🤔 दिक्कतें क्या हैं? फ्लीट की उम्र और डिफेक्ट्स
मैनेजमेंट के वादों के बावजूद, एयर इंडिया के बड़े बदलाव में एग्जीक्यूशन से जुड़ी बड़ी दिक्कतें हैं। ग्लोबल सप्लाई चेन में दिक्कतें, चाहे वो इंजन की हों या केबिन कंपोनेंट्स की, इनकी वजह से ड्रीमलाइनर का रेट्रोफिट करीब एक साल और 777 का रेट्रोफिट दो साल पीछे चल रहा है। देरी का एक कारण सप्लायर का बाहर निकल जाना भी है, जैसे कि एक प्रमुख सीट निर्माता का प्रोग्राम से हटना, जिसके बाद एयर इंडिया को फिर से सप्लायर ढूंढना पड़ रहा है। इसके अलावा, नए केबिन कॉन्फिगरेशन के लिए रेगुलेटरी सर्टिफिकेशन में भी काफी समय लग रहा है।
चिंताजनक बात यह है कि हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एयर इंडिया ग्रुप के 267 एनालाइज्ड प्लेन्स में से 72% में बार-बार खराबी (रिकरिंग डिफेक्ट्स) पाई गई हैं। हालांकि एयर इंडिया के स्पोक्सपर्सन का कहना है कि ये खराबी मुख्य रूप से सीटों और ट्रे टेबल जैसी नॉन-सेफ्टी-क्रिटिकल आइटम्स (कैटेगरी डी डिफेक्ट्स) से जुड़ी हैं, लेकिन इनकी बड़ी संख्या पुरानी फ्लीट को मॉडर्नाइज करने की चुनौती को दिखाती है। फ्लीट के कई प्लेन 15 से 20 साल पुराने हैं और स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल हो रहा है। नई प्लेन की डिलीवरी में देरी (बोइंग को भी प्रोडक्शन में दिक्कतें आई हैं) के साथ इन रिकरिंग इश्यूज का मिलना ऑपरेशनल रिलायबिलिटी पर असर डाल सकता है, जिससे कस्टमर सेटिस्फेक्शन प्रभावित हो सकता है। वहीं, 2025 में सप्लाई चेन की दिक्कतों से इंडस्ट्री को $11 बिलियन से ज्यादा का नुकसान होने का अनुमान है, जिसका सीधा असर एयर इंडिया जैसी एयरलाइंस पर फ्यूल और मेंटेनेंस खर्चों के रूप में पड़ रहा है।
आगे का रास्ता
टाटा ग्रुप का साथ एयर इंडिया के लिए फाइनेंशियल स्टेबिलिटी ला रहा है। भारतीय एविएशन मार्केट में यात्रियों की बढ़ती मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के चलते ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है। हालांकि, एयर इंडिया की प्रीमियम स्ट्रेटेजी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह इन ऑपरेशनल चुनौतियों से कैसे निपटती है और कैसा अनुभव देती है। एनालिस्ट्स सेक्टर में पोटेंशियल देखते हैं, लेकिन सप्लाई चेन इश्यूज और कैपिटल एक्सपेंडिचर की जरूरत जैसी दिक्कतें बनी हुई हैं। सीईओ विल्सन ने कंपनी के लॉन्ग-टर्म विजन को एक पांच दिवसीय क्रिकेट मैच की तरह बताया है, जिसमें धैर्य की जरूरत है, लेकिन प्रॉफिट में आने और कॉम्पिटिटिव पोजीशन मजबूत करने के लिए फ्लीट अपग्रेड्स का समय पर होना बेहद जरूरी है।