अडानी ग्रुप ने सरकार से एविएशन पॉलिसी में बदलाव की गुहार लगाई है। कंपनी चाहती है कि एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को एयरलाइंस में बड़ी हिस्सेदारी रखने की इजाजत मिले। अगर यह मांग मान ली जाती है, तो अडानी अपने एविएशन बिजनेस को बड़ा कर सकता है, लेकिन इसमें कुछ नियामकीय अड़चनें और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चिंताएं भी हैं।
Detailed Coverage
क्या है अडानी ग्रुप की मांग?
अडानी ग्रुप ने केंद्र सरकार से एविएशन पॉलिसी में बड़े बदलाव की मांग की है। मौजूदा नियमों के तहत, बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर्स एयरलाइंस में 10% से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकते। यह नियम 2006 में दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख एयरपोर्ट्स के निजीकरण के समय बनाए गए थे। अडानी ग्रुप चाहता है कि इस नियम में ढील दी जाए, ताकि वे अपने एयरपोर्ट मैनेजमेंट बिजनेस को एयरलाइन ऑपरेशंस के साथ जोड़ सकें।
मैन्युफैक्चरिंग प्लान्स के साथ तालमेल
यह कदम ग्रुप की बड़ी औद्योगिक योजनाओं का भी हिस्सा है। अडानी ग्रुप ब्राजील की Embraer कंपनी के साथ मिलकर भारत में एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने पर काम कर रहा है। खबरें हैं कि ग्रुप को घरेलू एयरलाइंस से Embraer एयरक्राफ्ट के ऑर्डर हासिल करने में मुश्किल आ रही है। ऐसे में, अगर अडानी अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करता है या उसमें बड़ी हिस्सेदारी रखता है, तो वे इन मैन्युफैक्चर्ड प्लेन्स के लिए एक तय खरीदार (captive market) बना सकते हैं, जिससे मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट को कमर्शियल रूप से सफल बनाया जा सके।
नियामकीय और प्रतिस्पर्धा की राह में अड़चनें
नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) इस मांग की कानूनी वैधता जांच रहा है और सॉलिसिटर जनरल से भी राय ली जा रही है। चूंकि यह नियम प्रमुख एयरपोर्ट्स के मूल कंसेशन एग्रीमेंट का हिस्सा है, इसलिए इसमें किसी भी बदलाव के लिए कैबिनेट की मंजूरी की जरूरत होगी।
फिलहाल भारतीय एविएशन मार्केट पर IndiGo और Air India का दबदबा है, जो मिलकर करीब 90% मार्केट शेयर पर काबिज हैं। सरकार भले ही इस डुओपॉली (duopoly) में नई, मजबूत प्रतिस्पर्धा लाना चाहे, लेकिन इस प्रस्ताव पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
उद्योग जगत के लोगों ने हितों के टकराव (conflict of interest) को लेकर चिंता जताई है। आलोचकों का कहना है कि अगर कोई एयरपोर्ट ऑपरेटर एयरलाइन भी चलाता है, तो उसे स्लॉट आवंटन (slot allocation) जैसी जगहों पर अनुचित लाभ मिल सकता है। इसके अलावा, अगर यह नियम एक ऑपरेटर के लिए हटाया जाता है, तो यह दूसरे बड़े एयरलाइन समूहों के लिए एयरपोर्ट्स खरीदने का रास्ता खोल सकता है, जिससे एविएशन सेक्टर की प्रतिस्पर्धा की तस्वीर ही बदल जाएगी। अडानी ग्रुप ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे फिलहाल किसी मौजूदा एयरलाइन को खरीदने की डील नहीं कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि यह एक लंबी अवधि की रणनीति होगी। निवेशकों को सरकार की अगली चर्चाओं और कंसेशन एग्रीमेंट में होने वाले किसी भी संभावित बदलाव पर नजर रखनी होगी।
