भारत के पर्यटन सेक्टर में अजीब स्थिति बनी हुई है। जहां घरेलू यात्राओं में जबरदस्त उछाल है, वहीं विदेशी पर्यटकों की संख्या में साल 2025 में **8.1%** की गिरावट दर्ज की गई और यह आंकड़ा **9.15 मिलियन** रहा।
भारत का टूरिज्म सेक्टर फिलहाल दो अलग-अलग रास्तों पर चल रहा है। एक तरफ घरेलू ट्रैवल सेगमेंट में भारी तेजी है, जहां पिछले साल खर्च $203 बिलियन के स्तर पर पहुंच गया, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की आवक संघर्ष कर रही है। साल 2025 में विदेशी पर्यटकों की संख्या गिरकर 9.15 मिलियन रह गई, जो पिछले साल के मुकाबले 8.1% कम है। इतना ही नहीं, यह आंकड़ा साल 2019 के 10.9 मिलियन के प्री-पेंडमिक पीक से 16% नीचे है।
वॉल्यूम बनाम वैल्यू का खेल
फिलहाल पर्यटन सेक्टर के कुल खर्च का करीब 86% घरेलू यात्रियों से आता है। लिस्टेड हॉस्पिटैलिटी और एविएशन कंपनियों के लिए यह एक सहारा तो है, लेकिन इसमें 'वैल्यू' की कमी है। अंतरराष्ट्रीय यात्री आमतौर पर ज्यादा खर्च करते हैं और प्रीमियम रूम्स या हायर-टियर ट्रैवल क्लास चुनते हैं। विदेशी पर्यटकों की कमी के कारण होटलों और ट्रैवल ऑपरेटर्स के लिए अपना प्रीमियम प्राइसिंग स्ट्रक्चर बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। इसके अलावा, थाईलैंड, मलेशिया और वियतनाम जैसे देशों के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ा जोखिम है।
चुनौतियां और बाधाएं
विदेशी पर्यटकों की घटती संख्या के पीछे वीजा प्रोसेस की जटिलता, सीमित अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी और यात्रा की बढ़ती लागत मुख्य वजहें हैं। सरकार का फोकस भले ही हाई-स्पीड रेल और एयरपोर्ट्स जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर है, लेकिन ग्लोबल प्रमोशन के लिए बजटीय आवंटन अभी भी पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। साथ ही, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे जियोपॉलिटिकल तनाव ने भी एयर कनेक्टिविटी को प्रभावित किया है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को सिर्फ घरेलू वॉल्यूम ग्रोथ ही नहीं, बल्कि ट्रैवल कंपनियों की फॉरेन एक्सचेंज अर्निंग्स और प्रमुख होटल चेन के 'एवरेज रूम रेट' (ARR) पर नजर रखनी चाहिए। अगर होटल कंपनियां अपने गेस्ट मिक्स में विदेशी पर्यटकों की हिस्सेदारी बढ़ाने में सफल होती हैं, तो यह उनकी बेहतर प्राइसिंग पावर का संकेत होगा। इसके अलावा, वीजा नियमों में ढील और ग्लोबल मार्केटिंग बजट में बढ़ोत्तरी पर भी नजर रखना जरूरी है।
