भारत का तिरुप्पुर, जो कि निटवेअर हब (Knitwear Hub) के नाम से जाना जाता है, अब अपने प्रोडक्शन में बड़ा बदलाव ला रहा है। कॉटन (Cotton) के साथ अब मैन-मेड फाइबर (MMF) का बराबर इस्तेमाल यानी 50:50 का लक्ष्य रखा गया है। इस कदम से कंपनी का लक्ष्य ग्लोबल डिमांड को भुनाकर 2030 तक निर्यात को ₹1 ट्रिलियन तक पहुंचाना है।
क्या है पूरा मामला?
तिरुपूर, जो भारत का मुख्य निटवेअर एक्सपोर्ट हब (Knitwear Export Hub) है, ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग स्ट्रेटेजी में एक बड़ा फेरबदल किया है। अब यहां कॉटन (Cotton) और मैन-मेड फाइबर (MMF) के प्रोडक्ट्स का 50:50 का रेशियो रखने का लक्ष्य है। पहले यह हब कॉटन पर ज्यादा फोकस करता था। हाल ही में, फाइनेंशियल ईयर 26 में तिरुप्पुर ने रिकॉर्ड ₹46,000 करोड़ का एक्सपोर्ट किया था। यूनियन टेक्सटाइल मिनिस्टर गिरिराज सिंह ने इस कदम को ग्लोबल मार्केट में कॉम्पिटिटिव (Competitive) बने रहने के लिए जरूरी बताया है। यह भारत के टेक्सटाइल एक्सपोर्ट को 2030 तक $100 बिलियन तक पहुंचाने के बड़े लक्ष्य के साथ भी जुड़ा हुआ है। उद्योग का मकसद 2030 तक अपने एक्सपोर्ट को ₹1 ट्रिलियन तक ले जाना है।
प्रोडक्शन में बड़ा बदलाव
ग्लोबल टेक्सटाइल मार्केट में इन दिनों MMF (जिसमें पॉलिएस्टर, नायलॉन और विस्कोस शामिल हैं) की डिमांड काफी बढ़ रही है। इसकी वजह MMF की ड्यूरेबिलिटी (Durability), कम मेंटेनेंस और एक्टिववेयर (Activewear) जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर्स के लिए इसकी उपयुक्तता है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, ग्लोबल फाइबर कंजम्पशन (Fiber Consumption) में MMF की हिस्सेदारी 70% से ज्यादा है, जो कॉटन से काफी आगे है। तिरुप्पुर के मैन्युफैक्चरर्स, जो अभी तक करीब 60% प्रोडक्शन कॉटन से करते आए हैं, इस बदलाव से अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो (Product Portfolio) के रिस्क को कम करना चाहते हैं और ज्यादा वैल्यू वाले सेगमेंट्स (Value Segments) में पैठ बनाना चाहते हैं। यह बदलाव प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और टेक्निकल टेक्सटाइल्स (Technical Textiles) के लिए स्टेट-लेवल मिशन जैसे सरकारी पहलों से भी प्रेरित है, जो मेडिकल, ऑटोमोटिव और स्पोर्ट्स अपैरल जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
₹1 ट्रिलियन के लक्ष्य तक का सफर
तिरुपूर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (Tiruppur Exporters Association) इस डायवर्सिफिकेशन (Diversification) को अपने ₹1 ट्रिलियन एक्सपोर्ट के रोडमैप का एक अहम हिस्सा मानता है। यह बदलाव पिछले एक दशक से एनवायरनमेंटल सस्टेनेबिलिटी (Environmental Sustainability) पर ध्यान केंद्रित करने के बाद आया है, जिसमें जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) टेक्नोलॉजीज को अपनाना शामिल है। हालांकि, इस नए लक्ष्य को हासिल करने के लिए सिर्फ प्रोडक्शन में बदलाव ही काफी नहीं है। इंडस्ट्री लीडर्स ने केंद्र सरकार से MMF प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (MMF Processing Infrastructure) के लिए 50% कैपिटल सब्सिडी (Capital Subsidy) और इम्पोर्ट प्रोसीजर (Import Procedures) को आसान बनाने में मदद मांगी है। इनগুলোর बिना, यह ट्रांजिशन हब पर हावी छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है।
ऑपरेशनल दिक्कतें और कॉम्पिटिशन
यह रणनीतिक बदलाव भले ही सही हो, लेकिन इसमें ऑपरेशनल रिस्क (Operational Risks) भी हैं। MMF के लिए डोमेस्टिक वैल्यू चेन (Domestic Value Chain) अभी भी उतनी मजबूत नहीं है, जिस कारण मैन्युफैक्चरर्स को इंपोर्टेड यार्न (Imported Yarn) पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इससे करेंसी की वोलैटिलिटी (Currency Volatility) या ज्यादा इंपोर्ट कॉस्ट (Import Costs) की स्थिति में मार्जिन (Margins) पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, तिरुप्पुर को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के स्थापित MMF एक्सपोर्टर्स से कड़ा मुकाबला झेलना पड़ रहा है, जिन्हें अक्सर कम लेबर कॉस्ट (Labor Costs) और फेवरेबल ड्यूटी स्ट्रक्चर्स (Favorable Duty Structures) का फायदा मिलता है। तिरुप्पुर के एक्सपोर्टर्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी तेजी से मशीनरी को अपग्रेड कर पाते हैं, कॉटन प्रोसेसिंग में माहिर वर्कफोर्स (Workforce) को नई स्किल्स सिखा पाते हैं और कॉम्पिटिटिव रेट्स पर रॉ मैटेरियल (Raw Material) की सप्लाई सिक्योर कर पाते हैं।
निवेशकों को इन बातों पर रखनी होगी नजर
निवेशकों को इस बात पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए कि यह हब MMF मशीनरी और इंफ्रास्ट्रक्चर में कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) को कितनी कुशलता से ट्रांसफर करता है। RoSCTL (Rebate of State and Central Taxes and Levies) स्कीम का विस्तार और टेक्निकल टेक्सटाइल सब्सिडीज (Technical Textile Subsidies) का इम्प्लीमेंटेशन (Implementation) कुछ मुख्य बिंदु होंगे जिन पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा, जैसे-जैसे इंडस्ट्री हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स (High-Value Products) की ओर बढ़ेगी, ऑपरेटिंग मार्जिन में बदलाव और ग्लोबल खरीदारों से कॉम्पिटिटिव मार्केट्स में लागत ट्रांसफर करने की मैन्युफैक्चरर्स की क्षमता इस स्ट्रेटेजिक शिफ्ट की सफलता के महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।
