शुक्रवार को भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर में ज़बरदस्त हलचल मची रही। खासकर Gokaldas Exports, KPR Mill, और Vardhman Textiles जैसे शेयरों में बड़ी उछाल देखी गई, वो भी तब जब ओवरऑल मार्केट में गिरावट थी। इस तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका के साथ एक संभावित ट्रेड डील की खबरें थीं, जिनसे भारतीय टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स को अमेरिका में ज़ीरो-ड्यूटी (zero-duty) एक्सेस मिल सकता है।
एक्सपोर्ट पर बूस्ट और मार्केट का रिएक्शन
पिछले शुक्रवार, 13 फरवरी को, BSE Sensex जहाँ 1.10% की गिरावट के साथ 82,757 अंकों पर बंद हुआ, वहीं टेक्सटाइल शेयरों ने अपनी अलग ही कहानी लिखी। Gokaldas Exports तो अपर सर्किट छूकर ₹895.55 पर जा पहुंचा। KPR Mill के शेयर 10% की उछाल के साथ ₹988 पर कारोबार करते दिखे, और Vardhman Textiles भी 8% बढ़कर ₹523.15 के स्तर पर जा पहुंचा। ये सब उन खबरों के दम पर हुआ जिनमें वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal ने संकेत दिए थे कि भारत अमेरिका के साथ एक ज़ीरो-ड्यूटी टेक्सटाइल डील करने की कोशिश कर रहा है। इसका मकसद बांग्लादेश को मिलने वाले फायदों के बराबर भारत को लाना है। इससे पहले 9 फरवरी को भी, भारत-अमेरिका के बीच एक शुरुआती ट्रेड फ्रेमवर्क की खबर से Gokaldas Exports जैसे शेयरों में 6.5% तक की तेज़ी दिखी थी, हालांकि बाद में 10 फरवरी को बांग्लादेश के साथ हुए ट्रेड टर्म्स पर कुछ चिंताएं दिखीं।
ज़ीरो-ड्यूटी उम्मीदों से परे, असल चुनौतियाँ
बाज़ार की यह प्रतिक्रिया काफी हद तक सेंटीमेंट पर आधारित है। अगर हम गहराई से देखें, तो तस्वीर थोड़ी अलग है। हाँ, यह डील चुनिंदा कपड़ों पर, खासकर अमेरिका से मंगाए गए कॉटन से बने कपड़ों पर, ज़ीरो-टैरिफ फायदे दे सकती है, जैसा कि बांग्लादेश को पहले से मिल रहा है। पर यहाँ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। जहाँ भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स के लिए नए US फ्रेमवर्क के तहत 18% का टैरिफ लग रहा है, वहीं बांग्लादेश को अपने हालिया डील के तहत कुछ खास वॉल्यूम पर 0% का टैरिफ मिल रहा है। इससे भारत के लिए एक कॉम्पिटिटिव गैप (competitive gap) बन जाता है।
हालांकि, इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि भारत की स्पिनिंग कैपेसिटी (spinning capacity) बांग्लादेश से कहीं ज़्यादा है, जो एक स्ट्रैटेजिक एडवांटेज (strategic advantage) दे सकती है। लेकिन, टैरिफ में यह इमीडिएट कॉस्ट का अंतर (immediate cost difference) काफी मायने रखता है।
EU FTA: लंबी अवधि का बड़ा मौका
सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि यूरोपियन यूनियन (EU) के साथ फाइनल हुई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) भी एक बड़ा मौका लेकर आई है। यह डील 2026 की शुरुआत से लागू हो सकती है और इसमें भारत के एक्सपोर्ट्स पर लगभग सभी टैरिफ खत्म हो जाएंगे, जो पहले 8-12% तक लगते थे। इससे भारत, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले बराबरी पर आ जाएगा। Axis Securities का मानना है कि ऐसे मल्टी-लैटरल एग्रीमेंट्स (multi-lateral agreements) टेक्सटाइल जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। इससे ऑर्डर्स बढ़ सकते हैं और वैल्यूएशन (valuation) में भी सुधार आ सकता है। आपको बता दें, EU, अमेरिका के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा टेक्सटाइल एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन है, और इस डील से 20-25% तक एक्सपोर्ट ग्रोथ का अनुमान है।
चिंताएं और फॉरेंसिक एनालिसिस
पर यह तो हुई अच्छी बातें। अब बात करते हैं उन चिंताओं की जो इन शेयरों के परफॉर्मेंस पर भारी पड़ सकती हैं। Gokaldas Exports की बात करें, तो MarketsMOJO ने इसकी वैल्यूएशन को 'Attractive' से 'Fair' कैटेगरी में डाल दिया है। इसका P/E रेश्यो 43.57 है, जो कई सेक्टर के साथियों के मुकाबले ज़्यादा है। वहीं, इसका ROCE (Return on Capital Employed) 8.61% और ROE (Return on Equity) 7.09% भी बहुत शानदार नहीं हैं, जो इतने ऊंचे मल्टीपल्स (multiples) को सपोर्ट नहीं कर पाते। Q3FY26 में तो Gokaldas का EBITDA भी 18% साल-दर-साल गिरा था, जिसकी एक वजह US टैरिफ का बोझ कस्टमर्स के साथ बांटना भी रहा।
Vardhman Textiles का P/E 18.43 है, जो इसे दूसरों के मुकाबले थोड़ा सस्ता दिखाता है। लेकिन, पिछले पांच सालों में इसकी सेल्स ग्रोथ सिर्फ 7.76% रही है और तीन साल का ROE भी 8.57% ही है। अमेरिका में बांग्लादेश को 0% टैरिफ का फायदा सीधे तौर पर भारत को 18% टैरिफ वाले मार्केट में कॉम्पिटिशन (competition) देगा। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि बांग्लादेश को भी अपने सप्लाई चेन को री-इंजीनियर (re-engineer) करना होगा और शायद ज़्यादा कॉस्ट भी आएगी, लेकिन फिलहाल इस खबर का असर शेयर के दाम पर दिख रहा है। और हाँ, पूरा मार्केट अभी भी थोड़ा कमजोर है, 13 फरवरी को BSE Sensex 1.25% गिरकर 82,626.76 पर बंद हुआ था।
भविष्य की राह
तो कुल मिलाकर, टेक्सटाइल सेक्टर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक तरफ ताज़ा ट्रेड डील की उम्मीदें हैं, तो दूसरी तरफ लंबी अवधि के मौके भी। EU FTA से तो लंबे समय तक ग्रोथ और मार्केट एक्सेस मिलने की उम्मीद है, जो पहले की कॉम्पिटिटिव दिक्कतों को दूर कर देगा। US डील की बारीकियों का इंतजार है, लेकिन जीरो-ड्यूटी का फायदा एक बड़ा फैक्टर रहेगा। Axis Securities जैसी फर्म्स का मानना है कि इससे क्षमता का बेहतर इस्तेमाल होगा और कमाई की विजिबिलिटी (visibility) बढ़ेगी। पर सवाल यह है कि क्या मौजूदा वैल्यूएशन (valuations) कमाई में इस तेज़ी को सपोर्ट कर पाएंगे? कंपनियों को कॉम्पिटिटिव प्रेशर झेलना होगा और ऑपरेशनल एफिशिएंसी (operational efficiency) पर ध्यान देना होगा। सेक्टर का फ्यूचर इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रेड पॉलिसीज़ कैसे आगे बढ़ती हैं और कंपनियां अलग-अलग बाजारों में कितनी अच्छी तरह से अपने आपको स्थापित कर पाती हैं।