J&K Handloom Weavers: इंडस्ट्री में बूम, पर बुनकरों की कमाई ठप! | Textile Sector Growth

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AuthorAditya Rao|Published at:
J&K Handloom Weavers: इंडस्ट्री में बूम, पर बुनकरों की कमाई ठप! | Textile Sector Growth

जम्मू और कश्मीर का टेक्सटाइल सेक्टर भले ही ₹850 करोड़ के निर्यात लक्ष्य की ओर बढ़ रहा हो, लेकिन स्थानीय हैंडलूम बुनकरों की कमाई ₹6,000-₹7,000 प्रति माह पर अटकी हुई है। यह अंतर सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता और प्रशासनिक बदलावों पर सवाल खड़े कर रहा है।

जम्मू और कश्मीर के टेक्सटाइल सेक्टर में दोहरी तस्वीर

जम्मू और कश्मीर का टेक्सटाइल सेक्टर एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ, सरकारी अनुमानों के मुताबिक, इस क्षेत्र से निर्यात 2025-26 तक ₹850 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगा, साथ ही रोजगार के अवसर बढ़ने के दावे भी किए जा रहे हैं। लेकिन, वहीं दूसरी तरफ, पारंपरिक हैंडलूम बुनकरों की आर्थिक हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। खास तौर पर, अपनी बारीक कारीगरी के लिए मशहूर कानी शॉल जैसे उत्पादों के बुनकरों की आय में कोई खास बढ़ोतरी नहीं देखी गई है।

बुनकरों की कमाई पर संकट

हैंडलूम बुनकरों के लिए, सेक्टर की यह कथित तरक्की उनकी जेब तक नहीं पहुंच रही है। कानी शॉल जैसे प्रीमियम हाथ से बुने उत्पाद को तैयार करने में महीनों लग जाते हैं, कभी-कभी तो छह महीने से भी ज्यादा का समय। इतनी मेहनत के बावजूद, बुनकरों को हर महीने सिर्फ ₹6,000 से ₹7,000 की कमाई हो रही है। यही वजह है कि युवा पीढ़ी इस पारंपरिक काम से दूर जा रही है और अधिक स्थिर रोजगार की तलाश कर रही है।

प्रशासनिक बदलावों का असर

उद्योग के जानकारों का मानना है कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद हुए प्रशासनिक फेरबदल का असर भी बुनकरों की स्थिति पर पड़ा है। हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट विभागों को एक ही इकाई में मिला दिया गया। हैंडलूम कोऑपरेटिव सोसाइटीज एसोसिएशन जैसी संस्थाओं का कहना है कि इस विलय से हैंडलूम क्षेत्र पर फोकस कम हो गया है और इसे पहले जैसी विशेष नीतियां और ध्यान नहीं मिल पा रहा है।

क्या है बुनकरों की मांग?

हैंडलूम कोऑपरेटिव समितियों ने बार-बार मांग की है कि हैंडलूम के लिए एक अलग विभाग फिर से स्थापित किया जाए, ताकि इस विशेष कला की जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके। हालांकि, अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यह स्थिति इस बात पर सवाल उठाती है कि सेक्टर-लेवल पर चलाई जा रही सरकारी योजनाएं वास्तव में उन कारीगरों तक पहुंच भी रही हैं या नहीं, जो इस उद्योग की रीढ़ हैं। यह देखना अहम होगा कि सरकार इस आय के अंतर को पाटने और पारंपरिक कला को बचाने के लिए क्या विशेष वित्तीय या संरचनात्मक कदम उठाती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.