वैश्विक संघर्षों ने जगाई यार्न एक्सपोर्ट की उम्मीदें
वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों (Geopolitical Tensions) ने भारतीय कॉटन यार्न एक्सपोर्ट को अप्रत्याशित बूस्ट दिया है। मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के चलते कई देशों के व्यापार मार्ग (Trade Routes) बदल गए हैं, जिससे भारतीय यार्न की सप्लाई की मांग बढ़ी है। साथ ही, भारतीय रुपये के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने का फायदा भारतीय निर्यातकों को मिल रहा है। इसी वजह से, इस साल चीनी खरीदारों के लिए भारतीय यार्न करीब 7% तक सस्ता हो गया है। Fiotex Cotspin के मैनेजिंग डायरेक्टर, रिपल पटेल (Ripple Patel) ने बताया कि उनके एक्सपोर्ट ऑर्डर बुक (Export Order Book) में 40% की बढ़ोतरी हुई है और वे जून तक के लिए पूरी क्षमता (Full Capacity) से काम कर रहे हैं। नवंबर के बाद से भारत से चीन के लिए हर महीने कंटेनर शिपमेंट (Container Shipments) पांच गुना बढ़कर लगभग 1,500 कंटेनर हो गए हैं, जिनमें करीब 30,000 टन यार्न भेजा जा रहा है। वैश्विक कपास (Cotton) की कीमतों में भी इजाफा हुआ है, जो पिछले महीने 17.03% बढ़कर 78.62 USD/Lbs तक पहुंच गई है।
गुजरात पोर्ट्स की चांदी, पर इंडस्ट्री पर संकट
गुजरात के मिल्स (Mills) कपास उगाने वाले क्षेत्रों और प्रमुख पोर्ट्स (Ports) के करीब होने के कारण इस एक्सपोर्ट डिमांड का फायदा उठाने में अच्छी स्थिति में हैं, जिससे लॉजिस्टिक्स (Logistics) लागत कम होती है। यह दक्षिणी राज्यों के मिल्स की तुलना में उन्हें एक बेहतर पोजीशन देता है। हालांकि, Fiotex जैसी कंपनियाँ भले ही फल-फूल रही हों, लेकिन भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (Manufacturing Sector) की बड़ी इंडस्ट्री कई गंभीर सप्लाई चेन (Supply Chain) समस्याओं का सामना कर रही है। कमर्शियल गैस की कमी और प्लास्टिक तथा इंडस्ट्रियल स्पेयर पार्ट्स (Industrial Spare Parts) की कीमतों में भारी उछाल आम बात हो गई है। भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर (Textile Sector) देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है और इसके 2034 तक USD 656.31 Billion तक पहुंचने का अनुमान है, जिसकी एनुअल ग्रोथ रेट 11.38% रह सकती है।
लागतों में बेतहाशा बढ़ोतरी से मिलों पर दबाव
कॉटन यार्न के मजबूत एक्सपोर्ट आंकड़ों के बावजूद, भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री को लागत के मोर्चे पर भारी दबाव झेलना पड़ रहा है। निर्माताओं के अनुसार, कच्चे माल (Raw Material) की लागत में 20-25% की बढ़ोतरी हुई है, जिसका मुख्य कारण भू-राजनीतिक तनावों के चलते कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाना है। इससे पेट्रोलियम-आधारित इनपुट्स (Petroleum-based Inputs) की लागत काफी बढ़ गई है। पॉलीस्टर (Polyester) की कीमतें लगभग 20% और केमिकल्स व डाई (Chemicals/Dyes) की लागतें भी करीब 20% बढ़ी हैं। कुल मिलाकर, गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग (Garment Manufacturing) की लागत 10-15% तक बढ़ गई है। इन मुश्किलों को और बढ़ाते हुए, वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधानों और संघर्ष क्षेत्रों के आसपास मार्ग बदलने के कारण शिपिंग और फ्रेट (Shipping and Freight) लागत 80-90% तक बढ़ गई है। इससे ट्रांज़िट समय (Transit Times) में अनुमानित 10-15 दिनों की देरी हो रही है। जिन सेक्टर्स के लिए लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा महत्वपूर्ण हैं, उन पर अगले तीन महीनों में दबाव बढ़ने की उम्मीद है। इसके अलावा, अमेरिका जैसे बड़े बाजारों में एक्सपोर्ट करने के लिए चीन की तुलना में भारत को ज़्यादा शिपिंग समय लगता है, जो एक स्वाभाविक नुकसान पैदा करता है। भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर का औसत P/E रेशियो (P/E Ratio) करीब 13.99 है। लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की स्थिति में लागतों में यह वृद्धि जारी रह सकती है और चीन से मांग में बदलाव की आशंका भी बनी हुई है, जो एक्सपोर्ट ग्रोथ के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
आगे का रास्ता: वैश्विक अनिश्चितता के बीच विकास कैसे जारी रखें
चीन से मजबूत मांग और अनुकूल विनिमय दर (Exchange Rate) के सहारे भारतीय कॉटन यार्न एक्सपोर्टर्स के लिए तत्काल संभावनाएं मजबूत दिख रही हैं। हालांकि, सेक्टर की दीर्घकालिक सफलता बढ़ती इनपुट लागतों और व्यापक भारतीय मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को प्रभावित करने वाली लॉजिस्टिकल बाधाओं को प्रबंधित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों के लिए वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच ग्रोथ बनाए रखने हेतु एक्सपोर्ट बाजारों का विविधीकरण (Diversification) और रणनीतिक लागत प्रबंधन (Strategic Cost Management) महत्वपूर्ण होगा।
