भारत की MMF इंडस्ट्री पर टैक्स का उल्टा खेल! ग्लोबल कॉम्पिटिटिशन में पिछड़ने का खतरा

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत की MMF इंडस्ट्री पर टैक्स का उल्टा खेल! ग्लोबल कॉम्पिटिटिशन में पिछड़ने का खतरा
Overview

भारत की मैन-मेड फाइबर (MMF) इंडस्ट्री इन दिनों बड़ी मुश्किलों का सामना कर रही है। वजह है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) का उल्टा ढांचा, जो कंपनी के प्रोडक्शन कॉस्ट (Production Cost) को बढ़ा रहा है। इस वजह से भारतीय कंपनियां ग्लोबल मार्केट में अपने कॉम्पिटिटर्स (Competitors) के मुकाबले पिछड़ रही हैं।

टैक्स का उल्टा खेल: कैसे बढ़ रही है प्रोडक्शन कॉस्ट?

भारत की मैन-मेड फाइबर (MMF) इंडस्ट्री के लिए गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) का मौजूदा ढांचा एक बड़ी रुकावट बन गया है। पॉलीएस्टर (Polyester) के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) पॉलीमर्स पर जहां 18% GST लगता है, वहीं तैयार पॉलीएस्टर यार्न (Yarn) पर केवल 5% GST है। इस उलटफेर का मतलब है कि कंपनियों को अपने जरूरी कच्चे माल पर फाइनल प्रोडक्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा टैक्स देना पड़ रहा है।

यही हाल विस्कोस स्टेपल फाइबर (Viscose Staple Fibre - VSF) का भी है। VSF बनाने के लिए जरूरी लकड़ी के गूदे (Rayon-grade wood pulp) पर 18% GST है, जबकि तैयार VSF प्रोडक्ट पर यह दर सिर्फ 5% है। इससे डोमेस्टिक कंपनियों के लिए प्रोडक्शन कॉस्ट (Production Cost) सीधे तौर पर बढ़ जाती है।

और मुश्किल

ASEAN देशों से तैयार VSF पर कोई ड्यूटी (Duty) नहीं लगती, जबकि भारत के प्रमुख कच्चे माल, लकड़ी के गूदे पर भारतीय उत्पादकों को लगभग 2.5% का इफेक्टिव ड्यूटी (Effective Duty) भरना पड़ता है। यह ट्रेड इम्बैलेंस (Trade Imbalance) सीधे तौर पर इंपोर्ट को बढ़ावा देता है और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स (Domestic Manufacturers) की कमर तोड़ देता है।

ग्लोबल कॉम्पिटिटर्स (Global Competitors) से कैसे पिछड़ रहे हैं?

भारतीय MMF उत्पादकों की लागत उनके विदेशी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में काफी ज्यादा है। इंडोनेशिया जैसे देशों के कॉम्पिटिटर्स (Competitors) को सल्फर (Sulphur) और नेचुरल गैस (Natural Gas) जैसे जरूरी कच्चे माल पर ड्यूटी-फ्री एक्सेस (Duty-Free Access) मिलता है, जिससे उनकी लागत भारत की कंपनियों से काफी कम हो जाती है।

क्वालिटी पर भी सवाल

हाल ही में VSF पर क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (Quality Control Orders) को वापस लेने से बाजार में निम्न गुणवत्ता वाले इंपोर्ट (Import) की बाढ़ आ सकती है। इससे प्रतिस्पर्धा और बढ़ेगी, जो क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (Quality Standards) और डोमेस्टिक प्रोडक्शन (Domestic Production) को नुकसान पहुंचा सकती है।

लॉजिस्टिक (Logistics) की समस्या

चीन जैसे मैन्युफैक्चरिंग हब (Manufacturing Hub) के विपरीत, जहां इंडस्ट्री एक जगह केंद्रित है, भारत में टेक्सटाइल प्रोडक्शन (Textile Production) कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे लॉजिस्टिक (Logistics) में भारी दिक्कतें आती हैं और ऑपरेशनल कॉस्ट (Operational Cost) बढ़ जाती है।

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज (DGTR) की जांच में भी इन स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम्स (Structural Problems) का खुलासा हुआ था, जिसमें उल्टे ड्यूटी स्ट्रक्चर (Inverted Duty Structure) जैसी बातें शामिल थीं। हालांकि, DGTR द्वारा सुझाए गए कई समाधानों पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है, जिससे सेक्टर का विकास बाधित हो रहा है।

आगे की राह: बड़े सुधारों की है जरूरत

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स (Industry Experts) का मानना है कि असली और टिकाऊ एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस (Export Competitiveness) मजबूत डोमेस्टिक अपस्ट्रीम (Upstream) और डाउनस्ट्रीम (Downstream) क्षमताओं पर निर्भर करती है, जिसके लिए पूरे वैल्यू चेन (Value Chain) में एक मजबूत इन्वेस्टमेंट क्लाइमेट (Investment Climate) जरूरी है। इंपोर्ट से मिलने वाले थोड़े समय के प्राइस बेनिफिट्स (Price Benefits) को इंडस्ट्री की लंबी सेहत नहीं माना जाना चाहिए।

यह बहुत जरूरी है कि उल्टे ड्यूटी स्ट्रक्चर (Inverted Duty Structure) जैसी समस्याओं को ठीक किया जाए, जो डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन (Domestic Value Addition) को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रही हैं। जब तक ये स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (Structural Reforms) नहीं होते, MMF इंडस्ट्री की एक्सपोर्ट ग्रोथ (Export Growth) और इकोनॉमिक कॉन्ट्रिब्यूशन (Economic Contribution) सीमित रहेगा।

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