National Fibre Scheme: भारत का बड़ा दांव! फाइबर प्रोडक्शन **50%** बढ़ाने का लक्ष्य, पर चुनौतियाँ भी अपार

TEXTILE
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
National Fibre Scheme: भारत का बड़ा दांव! फाइबर प्रोडक्शन **50%** बढ़ाने का लक्ष्य, पर चुनौतियाँ भी अपार
Overview

सरकार ने **FY27** बजट में महत्वाकांक्षी National Fibre Scheme का ऐलान किया है। इसका मुख्य लक्ष्य **FY31** तक देश में फाइबर प्रोडक्शन को **50%** बढ़ाना और इम्पोर्ट को **22%** तक कम करना है। इस स्कीम से भारत की वैश्विक मार्केट में कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) को बढ़ावा मिलेगा।

टेक्सटाइल सेक्टर में आत्मनिर्भरता का महा-मिशन

इस स्कीम का सबसे बड़ा मकसद भारत के टेक्सटाइल रॉ मटेरियल सेक्टर को मजबूती देना है। सरकार सिर्फ प्रोडक्शन बढ़ाने पर ही फोकस नहीं कर रही, बल्कि क्वालिटी के गैप को पाटने और उन स्ट्रक्चरल कमियों को दूर करने की कोशिश कर रही है, जिनकी वजह से अब तक भारत वैश्विक स्तर पर पिछड़ता रहा है। इस कदम से भारत टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग में एक मजबूत खिलाड़ी बनने की राह पर है और चीन जैसे दिग्गजों को सीधी टक्कर देने की तैयारी में है।

प्रोडक्शन का बूस्ट: लक्ष्य और वैश्विक सपने

National Fibre Scheme के तहत, FY31 तक भारत का फाइबर प्रोडक्शन 50% से ज्यादा बढ़कर 22.8 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं, इसी अवधि में कॉटन, सिल्क, जूट और मैन-मेड फाइबर (MMF) के इम्पोर्ट में 22% की कमी लाने का भी लक्ष्य है। इस प्रोडक्शन बूम को भारत सरकार के बड़े इकोनॉमिक लक्ष्यों से भी जोड़ा गया है। अनुमान है कि 2030 तक इस सेक्टर में 80 लाख (8 मिलियन) नई नौकरियां पैदा होंगी और फाइबर प्रोडक्शन में भारत की ग्लोबल हिस्सेदारी 8% से बढ़कर 12% हो जाएगी। स्कीम का एक और अहम लक्ष्य कंजम्पशन पैटर्न को बदलना है, ताकि ग्लोबल ट्रेंड के हिसाब से मैन-मेड फाइबर और नेचुरल फाइबर का रेश्यो 60:40 हो सके।

ग्लोबल मार्केट में मुकाबला: देशों की ताकत और मार्केट शेयर

भारत को चीन, बांग्लादेश और इटली जैसे देशों से कड़ा मुकाबला मिल रहा है। चीन तो ग्लोबल टेक्सटाइल सेल्स में $300 बिलियन सालाना से अधिक का एक्सपोर्ट करके राज कर रहा है। वह यार्न और फैब्रिक मार्केट के बड़े हिस्से पर काबिज है, यहाँ तक कि बांग्लादेश जैसे देशों में भी जहाँ भारत कभी हावी था। भारत कॉटन फैब्रिक का पांचवां सबसे बड़ा एक्सपोर्टर जरूर है, लेकिन चीन और इटली से काफी पीछे है। स्कीम का मकसद क्वालिटी गैप्स को भरना और स्ट्रक्चरल कमियों को दूर करना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि भारत उन देशों से मुकाबला कर सके जिनके पास बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन, एडवांस टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन की ताकत है। चीन मैन-मेड फाइबर (MMF) में बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन, वैरायटी और इनोवेशन के मामले में एक बड़ा बेंचमार्क है। बांग्लादेश और वियतनाम भी कम प्रोडक्शन कॉस्ट के चलते भारत के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।

निवेश का समीकरण: सरकारी छूट और आधुनिकीकरण

अपने बड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, सरकार प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और कैपिटल सब्सिडी जैसे फिस्कल इंसेंटिव्स पर विचार कर रही है। टेक्सटाइल सेक्टर के लिए PLI स्कीम, खासकर MMF और टेक्निकल टेक्सटाइल्स सेगमेंट में, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट बढ़ाने में मदद करेगी। हालाँकि, अतीत में टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड स्कीम (TUF) जैसी सरकारी पहलों में भी इम्प्लीमेंटेशन की जटिलता, देरी और बदलते नियमों को लेकर कम्युनिकेशन गैप जैसी दिक्कतें देखी गई हैं, जिससे MSMEs को इसका फायदा उठाने में मुश्किल हुई। इन नए इंसेंटिव्स की सफलता सुचारू प्रक्रियाओं और सभी के लिए आसान पहुंच पर निर्भर करेगी, ताकि छोटे कारोबारी भी इसका लाभ उठा सकें। ग्लोबल फाइबर कंजम्पशन में MMF का हिस्सा 63% से ज्यादा हो चुका है, जो नेचुरल फाइबर की तुलना में ज्यादा मजबूती और बेहतर कलर ऑप्शन देता है।

स्ट्रक्चरल कमज़ोरियाँ और एग्जीक्यूशन का जोखिम

इस स्कीम के मजबूत इरादों के बावजूद, भारत का टेक्सटाइल सेक्टर गहरी स्ट्रक्चरल समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें पुरानी इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी, खंडित सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें और कुशल मजदूरों की कमी शामिल हैं। रॉ मटेरियल की कीमतों में अस्थिरता, जो मौसम और भू-राजनीतिक घटनाओं से और बढ़ जाती है, प्रॉफिट मार्जिन को कम करती है और कॉम्पिटिटिवनेस को प्रभावित करती है। भारत कॉटन का बड़ा उत्पादक होने के बावजूद, कुछ क्वालिटी वाले रॉ मटेरियल के लिए इम्पोर्ट पर निर्भर है, जो घरेलू प्रोसेसिंग कैपेसिटी में कमी को दर्शाता है। इसके अलावा, दुनिया भर में MMF की डिमांड बढ़ रही है; 1996 में जहाँ यह ग्लोबल प्रोडक्शन का 45% था, वहीं 2023 तक यह 72% से ज्यादा हो गया है, जबकि नेचुरल फाइबर, खासकर कॉटन का शेयर कम हुआ है। MMF और नेचुरल फाइबर का 60:40 का लक्ष्य हासिल करने के लिए MMF के डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ाना होगा और पेट्रोकेमिकल-आधारित सिंथेटिक्स की मोनोपॉली को भी देखना होगा। यह एक बड़ा एग्जीक्यूशन जोखिम है कि कहीं सरकारी स्कीमें अतीत की तरह जटिल न साबित हों, जिससे छोटे व्यवसायों तक लाभ पहुंचने में देरी हो।

आगे की राह: सेक्टर का भविष्य और पॉलिसी का विकास

National Fibre Scheme, PLI स्कीम और इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स को पुनर्जीवित करने के प्रयासों के साथ मिलकर, भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को आगे बढ़ाने के लिए एक व्यापक रणनीति का संकेत देती है। जूट, ऊन और सिल्क में हायर वैल्यू एडिशन पर फोकस, साथ ही फाइबर टेक्नोलॉजीज के लिए 100 से अधिक पेटेंट फाइल करने का लक्ष्य, इनोवेशन और इंडस्ट्री लीडरशिप के लिए एक लॉन्ग-टर्म विज़न को दर्शाता है। इस स्कीम की सफलता एडमिनिस्ट्रेटिव जटिलताओं, मजबूत सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी को अपनाने और MMF की ओर बढ़ते ग्लोबल ट्रेंड को समझने की ऐतिहासिक चुनौतियों को पार करने पर निर्भर करेगी। सरकार के हालिया सुधार, जैसे कि विस्कोस स्टेपल फाइबर (VSF) जैसे मुख्य रॉ मटेरियल पर क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स को हटाना, कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस को बहाल करने और इनोवेशन को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखते हैं, खासकर MSMEs के बीच। अगर इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत अपने महत्वाकांक्षी एक्सपोर्ट लक्ष्यों को हासिल करने और वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए तैयार हो सकता है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.