भारतीय टेक्सटाइल स्टॉक्स में आज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। निवेशक जहां एक तरफ एक्सपोर्ट में हो रही ग्रोथ से उत्साहित हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका की नई ट्रेड पॉलिसी और संभावित टैरिफ को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
एक्सपोर्ट में दम और सप्लाई चेन का फायदा
टेक्सटाइल सेक्टर को ग्लोबल रिटेलर्स द्वारा चीन से हटकर सप्लाई चेन डायवर्सिफाई करने की 'China+1' रणनीति का बड़ा फायदा मिल रहा है। इसके अलावा, सरकारी योजनाओं जैसे PLI स्कीम और PM MITRA पार्क्स ने भी कंपनियों को मजबूती दी है। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच टेक्सटाइल एक्सपोर्ट्स करीब ₹1.43 लाख करोड़ के रहे हैं, जिसमें सालाना आधार पर दो अंकों (double-digit) की ग्रोथ दर्ज की गई है।
अमेरिकी टैरिफ का रिस्क फैक्टर
एक्सपोर्ट की अच्छी रफ्तार के बावजूद, अमेरिका की बदलती ट्रेड पॉलिसी सेक्टर के लिए सिरदर्द बन गई है। 'Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' जैसे घटनाक्रमों के कारण बाजार में अनिश्चितता का माहौल है। निवेशकों को डर है कि जिन देशों के व्यापारिक संबंध रूस या ईरान से हैं, वहां से होने वाले इंपोर्ट पर अमेरिका ऊंचे टैरिफ लगा सकता है। चूंकि अमेरिका भारतीय टेक्सटाइल फर्मों का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है, इसलिए यह रिस्क सेक्टर की लॉन्ग-टर्म हेल्थ के लिए चुनौती बना हुआ है।
ऑपरेशनल चुनौतियां और मार्जिन पर दबाव
मैक्रो रिस्क के साथ-साथ घरेलू कंपनियों के सामने काम करने की दक्षता (operational efficiency) भी एक बड़ी बाधा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई भारतीय फैक्ट्रियों में सिलाई आउटपुट अभी भी 58% से 70% के बीच अटका है। समय पर ऑर्डर डिलीवर करने के चक्कर में कंपनियों को अक्सर महंगे एयर-फ्रेट का सहारा लेना पड़ता है, जिससे उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आता है। इसके अलावा, कच्चे माल यानी कॉटन की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण लॉजिस्टिक्स कॉस्ट भी बढ़ रही है, जो मुनाफे को कम कर सकती है।
