Indian Textile Sector: चीन+1 स्ट्रैटेजी से बड़ी उम्मीदें, पर स्केल-अप की चुनौती बरकरार

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Textile Sector: चीन+1 स्ट्रैटेजी से बड़ी उम्मीदें, पर स्केल-अप की चुनौती बरकरार

भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी ग्रोथ का मौका खुला है। दुनिया भर की बड़ी कंपनियां सप्लाई चेन को चीन से हटाकर दूसरी जगहों पर ले जा रही हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों को फायदा हो सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी फैक्टरी उत्पादकता बढ़ानी होगी, गारमेंट ऑपरेशन का स्केल बढ़ाना होगा और मैन-मेड फाइबर की ओर रुख करना होगा।

क्यों भारत के लिए खुला है मौका?

दुनिया भर के रिटेलर्स अब अपनी मैन्युफैक्चरिंग बेस को डायवर्सिफाई कर रहे हैं। इस 'चाइना+1' स्ट्रैटेजी के तहत, भारतीय टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स के पास ग्लोबल मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का एक शानदार मौका है। लेकिन, पिछले 20 सालों से भारत का ग्लोबल अपैरल ट्रेड में शेयर करीब 3% पर ही अटका हुआ है। वहीं, बांग्लादेश का शेयर 9-10% और वियतनाम का 6-7% है।

स्केल-अप और कॉम्पिटिटिवनेस की जंग

निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय कंपनियां अपनी पुरानी दिक्कतों को दूर कर पाएंगी? इंडस्ट्री अभी भी काफी बिखरी हुई है, जिसमें छोटी प्रोडक्शन यूनिट्स हैं जो बड़े ऑर्डर्स को संभालने मेंstruggle करती हैं। सिर्फ कम लागत के भरोसे अब काम नहीं चलेगा। इंटरनेशनल बायर्स अब फैक्ट्री की विश्वसनीयता, तेजी से लीड टाइम और लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी जैसी चीजों को प्राथमिकता दे रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग को रॉ-मटेरियल से लेकर फाइनल गारमेंट असेंबली तक इंटीग्रेट करने की क्षमता, लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने में अहम साबित होगी।

कॉटन से आगे, मैन-मेड फाइबर की ओर

सेक्टर की भविष्य की परफॉरमेंस इस बात पर भी निर्भर करती है कि कंपनियां अपने प्रोडक्ट मिक्स में कितना बदलाव लाती हैं। भारत का कॉटन टेक्सटाइल्स में मजबूत इतिहास रहा है, लेकिन ग्लोबल डिमांड अब मैन-मेड फाइबर, टेक्निकल टेक्सटाइल्स और परफॉरमेंस अपैरल की ओर बढ़ रही है। इन हाई-वैल्यू सेगमेंट्स में जाने के लिए टेक्नोलॉजी और ट्रेनिंग में बड़े कैपिटल इन्वेस्टमेंट की जरूरत होगी। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां केवल कॉटन पर निर्भर रहने के बजाय, ऑटोमेशन और एडवांस्ड फाइबर कैपेबिलिटीज में निवेश कर रही हैं या नहीं।

एग्जीक्यूशन और पॉलिसी की चुनौतियां

ट्रेड एग्रीमेंट्स से टैरिफ एडवांटेज तो मिलता है, लेकिन इसका कंपनी के रेवेन्यू और प्रॉफिट मार्जिन पर असर तभी पड़ता है जब ऑपरेशनल तैयारी मजबूत हो। टैरिफ का फायदा तभी है जब मैन्युफैक्चरर ग्लोबल कंप्लायंस स्टैंडर्ड्स, सस्टेनेबिलिटी रिक्वायरमेंट्स और डिलीवरी टाइमलाइन को पूरा कर सके। इंडस्ट्री के सामने नई, बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर बनाने की चुनौती भी है, जो वर्कर प्रोडक्टिविटी बढ़ा सकें। ऐतिहासिक रूप से, स्केल-अप न कर पाने की वजह से इस सेक्टर में कई कंपनियों को कॉस्ट ओवरruns और कम रिटर्न ऑन इन्वेस्टेड कैपिटल का सामना करना पड़ा है। वर्तमान शिफ्ट की सफलता, अनुशासित कैपिटल एलोकेशन और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों से मार्जिन बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी, जिन्होंने पहले से ही बड़े पैमाने पर गारमेंटिंग ऑपरेशंस में महारत हासिल कर ली है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.