India-EU Free Trade Agreement (FTA) के लागू होने से पहले भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स ने यूरोपीय फैशन ब्रांड्स के साथ अपनी पकड़ मजबूत करना शुरू कर दिया है। साल **2027** तक टैरिफ घटकर शून्य हो जाएंगे, जिससे कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी, हालांकि EU के कड़े सस्टेनेबिलिटी नियमों का पालन करना निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
भारत का टेक्सटाइल उद्योग अब यूरोप के बाजार में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बनाने की तैयारी में है। FTA के तहत, भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंध नए स्तर पर पहुंच रहे हैं। कपड़ा मंत्रालय और Apparel Export Promotion Council (AEPC) ने LVMH और Chanel जैसे बड़े वैश्विक ब्रांड्स के साथ साझेदारी के लिए बातचीत तेज कर दी है।
FTA का बड़ा फायदा (The Tariff Advantage)
जनवरी 2026 में FTA वार्ता के सफल समापन के बाद, 2027 तक सभी ट्रेड ड्यूटी को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। अभी तक भारतीय गारमेंट एक्सपोर्टर्स को 8% से 12% तक का भारी टैरिफ देना पड़ता था। इसके हटने से बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारतीय कंपनियों को बड़ी कीमत की बढ़त (Price Advantage) मिलेगी।
हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स पर फोकस
भारतीय कंपनियां अब सिर्फ वॉल्यूम पर नहीं, बल्कि मुनाफे पर ध्यान दे रही हैं। Première Vision SA जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर मिलान में 'Immersion Centre' खोलने की योजना है, ताकि भारत से केवल बेसिक गारमेंट्स ही नहीं, बल्कि प्रीमियम और टेक्निकल टेक्सटाइल का एक्सपोर्ट बढ़ाया जा सके।
सस्टेनेबिलिटी की चुनौती (The Compliance Hurdle)
निवेशकों को यहाँ सावधान रहने की जरूरत है। यूरोप के नए नियम जैसे Corporate Sustainability Reporting Directive (CSRD) और Eco-design for Sustainable Products Regulation (ESPR) काफी सख्त हैं। इन नियमों के तहत कार्बन फुटप्रिंट, सर्कुलरिटी और सप्लाई चेन ट्रांसपेरेंसी साबित करना अनिवार्य है। यदि भारतीय कंपनियां इन मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं, तो अनुपालन (Compliance) में होने वाला भारी खर्च FTA से मिलने वाले मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर सकता है।
आने वाले क्वार्टर्स में निवेशकों को कंपनियों के सस्टेनेबिलिटी ऑडिट और उनके प्रोडक्ट मिक्स में बदलाव पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इसी से यह तय होगा कि कौन सी कंपनी वास्तव में इस व्यापार समझौते का फायदा उठा पाएगी।
