Textile Sector: चीन को छोड़ भारत की ओर दुनिया, पर इस एक चीज की है सबसे ज्यादा जरूरत!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Textile Sector: चीन को छोड़ भारत की ओर दुनिया, पर इस एक चीज की है सबसे ज्यादा जरूरत!

भारत का टेक्सटाइल सेक्टर इस वक्त दुनिया भर के बड़े ब्रांड्स के लिए एक बड़ा मौका बनकर उभरा है। जैसे-जैसे ग्लोबल ब्रांड्स चीन पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं, भारत एक अहम विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इस मौके को भुनाने और एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए भारतीय कंपनियों को अपनी फैक्ट्रियों का स्केल बढ़ाना होगा, ऑटोमेशन पर जोर देना होगा और मैन-मेड फाइबर जैसे नए क्षेत्रों में उतरना होगा, ताकि वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से मुकाबला कर सकें।

चीन+1 स्ट्रैटेजी का फायदा?

दुनिया भर की सप्लाई चेन में हो रहे बदलावों का फायदा भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री को मिल सकता है। ग्लोबल अपैरल ब्रांड्स अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं, और ऐसे में भारत उनके लिए एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आ रहा है। लेकिन, इस मौके को लगातार एक्सपोर्ट ग्रोथ में बदलना इतना आसान नहीं होगा। भारतीय कंपनियों को कुछ बड़ी चुनौतियों से निपटना होगा, जो अब तक उनके ग्लोबल मार्केट शेयर को सीमित किए हुए हैं।

बड़े पैमाने पर उत्पादन ही सफलता की कुंजी

भले ही भारत और यूके जैसे देशों के बीच संभावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से लागत कम हो सकती है और कॉम्पिटिशन बढ़ सकता है, लेकिन यह समाधान का सिर्फ एक हिस्सा है। अब तक के आंकड़े बताते हैं कि ग्लोबल अपैरल ट्रेड में भारत की हिस्सेदारी महज 3% के आसपास रही है। वहीं, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देश 9-10% और 6-7% हिस्सेदारी रखते हैं। इस अंतर को पाटने के लिए, भारतीय निर्माताओं को छोटे और बिखरे हुए उत्पादन मॉडल से बाहर निकलना होगा। बड़े ग्लोबल खरीदारों की जरूरतें अक्सर इन छोटे यूनिट्स से पूरी नहीं हो पातीं।

इस नई ग्लोबल सोर्सिंग में सफलता के लिए सिर्फ कम लेबर कॉस्ट नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन की कॉम्पिटिटिवनेस मायने रखेगी। बड़े ग्लोबल रिटेलर्स उन सप्लायर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं जो सप्लाई में लचीलापन, तेज डिलीवरी टाइम और भरोसेमंदता दे सकें। जो मैन्युफैक्चरर्स बड़े पैमाने पर गारमेंटिंग फैसिलिटीज, ऑटोमेशन और आधुनिक कंप्लायंस स्टैंडर्ड्स में निवेश करेंगे, वे उन हाई-वॉल्यूम ऑर्डर्स को पूरा करने के लिए बेहतर स्थिति में होंगे जो अभी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के पास जा रहे हैं।

कॉटन से आगे बढ़कर मैन-मेड फाइबर पर फोकस

निवेशकों के लिए इंडस्ट्री के प्रोडक्ट मिक्स पर नजर रखना भी बेहद जरूरी है। भारत का टेक्सटाइल सेक्टर पारंपरिक रूप से कॉटन-आधारित उत्पादों पर ज्यादा निर्भर रहा है। लेकिन, दुनिया भर में मैन-मेड फाइबर, परफॉरमेंस अपैरल और टेक्निकल टेक्सटाइल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। घरेलू कंपनियों के लिए अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी में विविधता लाना बहुत महत्वपूर्ण होगा। जिन कंपनियों में एडवांस्ड फाइबर और यार्न बनाने की क्षमता होगी, साथ ही वे कॉटन की क्वालिटी और ट्रेसिबिलिटी बनाए रख सकेंगे, उन्हें कॉम्पिटिटिव एज मिलेगा।

इसके अलावा, सेक्टर को नई मशीनरी और क्षमता विस्तार के लिए भारी कैपिटल इन्वेस्टमेंट की जरूरत है। निवेशकों के लिए यह एक ऐसी स्थिति है जहां सबसे सफल कंपनियां वे होंगी जो आक्रामक विस्तार और अनुशासित फाइनेंशियल कंट्रोल के बीच संतुलन बना सकेंगी। नई फैक्ट्रियों के लिए भारी कर्ज लेना, अगर ग्लोबल डिमांड में उतार-चढ़ाव आता है या नई क्षमता का तेजी से उपयोग नहीं हो पाता है, तो कर्ज का दबाव बढ़ सकता है।

भविष्य की परफॉरमेंस पर नजर

जैसे-जैसे इंडस्ट्री अपने स्केल को बढ़ाने की कोशिश कर रही है, निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि क्या अलग-अलग कंपनियां सफलतापूर्वक हाई-वैल्यू वाले प्रोडक्ट सेगमेंट में आगे बढ़ पा रही हैं। सफलता के प्रमुख संकेतक होंगे - प्रति कर्मचारी आउटपुट में लगातार सुधार, नए ऑटोमेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स का चालू होना और बड़े ग्लोबल ब्रांड्स के साथ लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने की क्षमता। असली परीक्षा यह होगी कि क्या भारतीय एक्सपोर्टर्स ग्लोबल सप्लाई चेन में एक प्राइमरी पार्टनर बनने के लिए जरूरी मैन्युफैक्चरिंग कंसिस्टेंसी दिखा पाते हैं, या वे सिर्फ एक सेकेंडरी सोर्सिंग विकल्प बनकर रह जाते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.