भारतीय गारमेंट एक्सपोर्टर्स के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। अमेरिका में महंगाई और कम खर्च के कारण हॉलिडे सीजन के ऑर्डर्स में **30%** की बड़ी गिरावट आई है। हालांकि यूरोप से मांग स्थिर है, लेकिन बढ़ते फ्रेट कॉस्ट ने मार्जिन पर दबाव बढ़ा दिया है।
भारतीय गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स के लिए इस बार का हॉलिडे सीजन काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। अमेरिका में लगातार बनी महंगाई और वहां के ग्राहकों की सुस्त मांग के कारण रिटेलर्स ने खरीदारी में काफी कटौती की है। क्रिसमस और नए साल के ऑर्डर्स में 30% की गिरावट देखी गई है, जो एक्सपोर्टर्स के लिए चिंता का विषय है। अब कई कंपनियों को फैक्ट्री चलाने के लिए या तो कम वॉल्यूम में काम करना पड़ रहा है या फिर डिस्काउंट देना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ रहा है।
एक्सपोर्ट रेवेन्यू और मार्जिन पर असर
इंडस्ट्री के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस में इस समय काफी उतार-चढ़ाव है। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में डॉलर के मुकाबले एक्सपोर्ट 6.2% गिरकर $7.2 बिलियन रह गया है, जबकि रुपये के टर्म में इसमें 3.4% की ग्रोथ देखी गई है। यह अंतर करेंसी वॉलिटिलिटी को दर्शाता है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डॉलर वॉल्यूम में यह कमी लंबे समय तक बनी रहेगी या फिर करेंसी के फायदे इसे संतुलित कर पाएंगे।
इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स की चुनौती भी कम नहीं है। रेड सी में सुरक्षा चिंताओं के कारण जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से भेजा जा रहा है। इससे फ्रेट कॉस्ट बढ़ गई है और डिलीवरी में देरी हो रही है। पतले मार्जिन पर काम करने वाली कंपनियों के लिए इन एक्स्ट्रा खर्चों को झेलना मुश्किल हो रहा है।
यूरोप से उम्मीद की किरण
राहत की बात यह है कि यूरोप और यूके का मार्केट फिलहाल स्टेबल बना हुआ है। वहां के रिटेलर्स की खरीदारी अमेरिकी मार्केट के मुकाबले बेहतर है, जिससे एक्सपोर्ट वॉल्यूम को काफी सहारा मिल रहा है।
Apparel Export Promotion Council का मानना है कि जैसे-जैसे समुद्री लॉजिस्टिक्स सुधरेगा, सेक्टर में सुधार की उम्मीद है। आने वाले समय में निवेशकों को कंपनियों के फ्रेट खर्चों और मार्जिन को बचाने की उनकी क्षमता पर पैनी नजर रखनी होगी।
