चीन के बाजार में भारतीय कॉटन यार्न की धूम मची है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में एक्सपोर्ट का आंकड़ा **$460 मिलियन** को पार कर गया है। भारत की बाजार हिस्सेदारी अब **21%** तक पहुंच चुकी है, लेकिन निवेशकों के लिए मार्जिन का दबाव अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है।
भारतीय कॉटन यार्न एक्सपोर्टर्स ने चीन के बाजार में अपना दबदबा कायम किया है। इस फाइनेंशियल ईयर में एक्सपोर्ट का आंकड़ा $460 मिलियन रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 112% ज्यादा है। केवल 10 महीने के भीतर ही भारतीय सप्लायर्स ने चीन के कुल कॉटन यार्न इंपोर्ट में अपनी हिस्सेदारी 7% से बढ़ाकर 21% कर ली है।
प्रीमियम प्रोडक्ट्स पर फोकस
भारतीय कंपनियां अब लो-मार्जिन कमोडिटी से हटकर हाई-वैल्यू और सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स पर जोर दे रही हैं। 'Kasturi Cotton Bharat' जैसी पहलों के जरिए कंपनियां अपनी गुणवत्ता और ट्रेसिबिलिटी को बेहतर बना रही हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतर सकें।
मार्जिन पर दबाव और चुनौतियां
एक्सपोर्ट वॉल्यूम बढ़ने के बावजूद टेक्सटाइल कंपनियों के लिए मुनाफा (Profit Margins) बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती है। डोमेस्टिक कॉटन की बढ़ती कीमतें और वियतनाम जैसे देशों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा निवेशकों के लिए चिंता की बात है। साथ ही, ग्लोबल मार्केट में सिंथेटिक या मैन-मेड फाइबर्स की मांग बढ़ने से लंबी अवधि में कॉटन आधारित कंपनियों के सामने स्ट्रक्चरल चुनौतियां आ सकती हैं। फिलहाल, अक्टूबर 2026 तक कॉटन इंपोर्ट पर कस्टम ड्यूटी में मिली छूट कंपनियों को थोड़ी राहत दे रही है।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
अगली तिमाहियों के नतीजों में यह देखना होगा कि कंपनियां एक्सपोर्ट वॉल्यूम की इस तेजी को बरकरार रख पाती हैं या नहीं। निवेशकों को खास तौर पर मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए कि कैसे वे कच्चे माल की बढ़ती लागत को ग्राहकों पर शिफ्ट करते हैं, जो सीधे तौर पर कंपनियों के बॉटम-लाइन पर असर डालेगा।
