टेक्सटाइल सेक्टर पर खास फोकस: क्या बदलेगा?
इस नए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में भारत से आने वाले सामानों पर लगने वाले आपसी टैरिफ को 25% से घटाकर 18% किया गया है। इसके अलावा, रूस से तेल खरीदने के भारत के फैसले के चलते अमेरिका द्वारा लगाई गई 25% की अतिरिक्त पनिशमेंट ड्यूटी को भी खत्म कर दिया गया है [9, 10, 27]। कॉमर्स मिनिस्टर पियूष गोयल ने भरोसा दिलाया है कि टेक्सटाइल सेक्टर के हितों की रक्षा की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अमेरिका के साथ अपने यार्न (yarn) और कॉटन (cotton) पर वैसे ही फायदे मिलेंगे, जैसे बांग्लादेश को मिल रहे हैं [36]। यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि अमेरिका साउथ एशिया में टेक्सटाइल से जुड़े क्लॉज़ (clauses) को एक समान करना चाहता है, जिसका मकसद ग्लोबल अपैरल बायर्स की सोर्सिंग (sourcing) से जुड़े फैसलों को प्रभावित करना है [news]।
वियतनाम, जो इस रीजन का एक बड़ा प्लेयर है, ने 2025 के पहले सात महीनों में अमेरिका को लगभग $9.5 बिलियन के अपैरल एक्सपोर्ट्स किए हैं, जो चीन से भी ज्यादा है और इसने वियतनाम को नंबर वन सप्लायर बना दिया है [3, 6]। 2025 में वियतनाम के कुल टेक्सटाइल और गारमेंट एक्सपोर्ट्स $18.6 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है [6]। इसके मुकाबले, बांग्लादेश के एक्सपोर्ट्स Q1 FY26 में $2.3 बिलियन रहे [8]। हालांकि भारत का टैरिफ 18% है, बांग्लादेश पर 19% टैरिफ लगेगा। लेकिन, बांग्लादेश को एक खास फायदा मिल सकता है: अमेरिका के कॉटन और मैन-मेड फाइबर्स से बने गारमेंट्स को कुछ कोटे के तहत अमेरिका में जीरो-ड्यूटी (zero-duty) पर इंपोर्ट किया जा सकेगा [17, 23, 29]। इस क्लॉज से भारतीय इंडस्ट्री के स्टेकहोल्डर्स चिंतित हैं कि कहीं बांग्लादेश फिर से प्राइसिंग में आगे न निकल जाए [17, 23]।
किसानों को सुरक्षा, एक्सपोर्ट्स को बूस्ट
मिनिस्टर गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत के 95% कृषि उत्पाद (farm produce) इस ट्रेड डील से बाहर हैं, जिसका मकसद घरेलू किसानों को बचाना है [14]। मीट, पोल्ट्री, डेयरी, गेहूं, चावल, मक्का, मिलेट्स और कुछ फल-सब्जियों जैसे सेंसिटिव एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स को एक सख्त 'नेगेटिव लिस्ट' में रखा गया है, जिन पर कोई टैरिफ कंसेशन (tariff concession) नहीं दिया गया है [35, 42]। भारत ने जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों पर अपना बैन बरकरार रखा है, खासकर अमेरिका से आने वाले GM कॉर्न और सोयाबीन के आयात पर रोक लगा दी है [35]। फिलहाल, भारत का एग्रीकल्चरल ट्रेड में अमेरिका के साथ $1.3 बिलियन का ट्रेड सरप्लस (trade surplus) है [35]। इस डील के तहत भारत को मसाले, चाय, कॉफी, काजू और नारियल जैसे एक्सपोर्ट्स के लिए जीरो-ड्यूटी एक्सेस (zero-duty access) मिलेगा [35]। इन सुरक्षा उपायों के बावजूद, भारत के एग्रीकल्चर और मरीन सेक्टर के लिए एक्सपोर्ट पोटेंशियल काफी बड़ा है, जिसमें अगले चार सालों में ₹20 लाख करोड़ ($20 बिलियन) तक पहुंचने और $100 बिलियन का कंबाइंड एक्सपोर्ट टारगेट हासिल करने की उम्मीद है [40, 46, 45]।
अमेरिका का 'स्टैंडर्डाइजेशन' प्लान
अमेरिका का साउथ एशिया में टेक्सटाइल प्रोविज़न्स (textile provisions) को स्टैंडर्डाइज करने का जोर, सोर्सिंग एनवायरनमेंट (sourcing environment) को ज्यादा प्रेडिक्टेबल और स्ट्रीमलाइन बनाने की एक बड़ी स्ट्रैटेजी का हिस्सा है [news]। यह कदम ग्लोबल अपैरल सप्लाई चेन्स (supply chains) के चल रहे रीअलाइनमेंट (realignment) को तेज कर सकता है। ब्रांड्स इस समय बढ़ती लेबर कॉस्ट और ट्रेड अनिश्चितताओं के चलते चीन जैसे पारंपरिक हब से डाइवर्सिफाई (diversify) कर रहे हैं [22, 38, 39]। भारत को एक प्रॉमिज़िंग सोर्सिंग डेस्टिनेशन (sourcing destination) के तौर पर देखा जा रहा है, जहां 65% यूएस फैशन एग्जीक्यूटिव्स (executives) भारत से सोर्सिंग बढ़ाना चाहते हैं [22]। इसकी तुलना में, अमेरिका के अपैरल इम्पोर्ट्स में चीन का शेयर घट रहा है [3]। यह फ्रेमवर्क एग्रीमेंट, जो मार्च 2026 से लागू होगा, एक फुल द्विपक्षीय ट्रेड एग्रीमेंट (bilateral trade agreement) की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका मकसद द्विपक्षीय ट्रेड को बढ़ाना और साथ ही भारतीय मार्केट को सिलेक्टिवली खोलना है [35, 48]।
चुनौतियां और कॉम्पिटिटिव प्रेशर
हालांकि यह ट्रेड डील भारतीय एक्सपोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए है, लेकिन कॉम्पिटिटिव लैंडस्केप (competitive landscape) में कुछ चुनौतियां भी हैं। अमेरिका के कॉटन और मैन-मेड फाइबर्स से बने गारमेंट्स के लिए बांग्लादेश का पोटेंशियल जीरो-टैरिफ एक्सेस [17, 23, 29], भले ही उसका हेडलाइन टैरिफ 19% (भारत के 18% के मुकाबले) थोड़ा ज्यादा हो, उसे बड़ा प्राइसिंग एडवांटेज दे सकता है [17, 23]। हालांकि, इस एडवांटेज को बांग्लादेश की इंपोर्टेड रॉ मैटेरियल्स, खासकर भारत से आने वाले कॉटन यार्न पर भारी निर्भरता [13] और अमेरिका से सोर्सिंग करने में संभावित लॉजिस्टिकल हर्डल्स (logistical hurdles) कम कर सकते हैं [23]। इसके अलावा, ग्लोबल अपैरल सोर्सिंग मार्केट बहुत कॉम्पिटिटिव होता जा रहा है, जहां ब्रांड्स टैरिफ और सप्लाई चेन रेज़िलिएंस (resilience) की जरूरत के चलते अपने सोर्सिंग बजट को और बारीकी से देख रहे हैं [22, 39]। बांग्लादेश के चिट्टागोंग पोर्ट (Chittagong Port) पर लेबर स्ट्राइक जैसी समस्याएं रीजनल सप्लाई चेन्स की इनहेरेंट वल्नरेबिलिटीज़ (inherent vulnerabilities) को दिखाती हैं [23]। ऐतिहासिक रूप से, भारत के एग्रीकल्चरल सेक्टर ने प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसीज़ (protectionist policies) को अपनाया है, और भले ही यह डील सिलेक्टिवली मार्केट खोल रही है, लेकिन DDGS जैसे प्रोडक्ट्स के बढ़ते इम्पोर्ट्स से डोमेस्टिक प्रोड्यूसर्स पर असर की चिंताएं बनी हुई हैं [42]। भले ही प्रेफरेंशियल मार्केट एक्सेस (preferential market access) मिले, ग्लोबल अपैरल इंडस्ट्री बढ़ते फ्रेट कॉस्ट (freight costs) और जियोपॉलिटिकल टेंशन्स (geopolitical tensions) के दबाव का सामना कर रही है, जिससे ब्रांड्स नियरशोरिंग (nearshoring) और रीजनलाइज्ड सप्लाई चेन्स (regionalized supply chains) को एक्सप्लोर कर रहे हैं [39]।
