जनवरी के ये एक्सपोर्ट आंकड़े (export data) बताते हैं कि भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री एक मुश्किल दौर से गुजर रही है। अमेरिका द्वारा टैरिफ में की गई कटौती से भले ही कुछ मदद मिले, लेकिन ग्लोबल ट्रेड पॉलिसी में बदलाव, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मैन-मेड फाइबर (man-made fiber) की ओर बढ़ता झुकाव इंडस्ट्री की दिशा तय कर रहे हैं। यह रिकवरी की कहानी उतनी सीधी नहीं है जितनी टैरिफ में कमी से लगती है, इसके लिए इंडस्ट्री की पोजिशन और मार्केट की चाल को समझना ज़रूरी है।
टैरिफ में बदलाव और बढ़ती प्रतिस्पर्धा
7 फरवरी 2026 को अमेरिकी टैरिफ में की गई कटौती से भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत मिली है। जनवरी में एक्सपोर्ट में 3.75% की गिरावट देखी गई थी, जिसका एक बड़ा कारण यही टैरिफ थे। पहले कुछ कैटेगरीज पर 50% तक टैरिफ लग रहे थे, जिससे भारत की कीमत प्रतिस्पर्धा (price competitiveness) पर असर पड़ रहा था। अब उम्मीद है कि यह कमी एक्सपोर्ट को बढ़ाएगी।
लेकिन, दुनिया भर में ट्रेड का माहौल और ज़्यादा मुश्किल होता जा रहा है। वियतनाम जैसे देश अपने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का फायदा उठा रहे हैं और 2026 तक $50 बिलियन एक्सपोर्ट का लक्ष्य रख रहे हैं। वहीं, बांग्लादेश के यूरोपियन यूनियन (EU) मार्केट में एक्सपोर्ट बढ़े हैं, पर कीमतों पर दबाव साफ दिख रहा है। अमेरिका भी भारत के कुछ टेक्सटाइल सामानों पर 18% का नया टैरिफ लगा रहा है। ऐसे में, भारत के एक्सपोर्ट में सुधार तो हो सकता है, लेकिन बायर अपनी सोर्सिंग स्ट्रैटेजी बदल रहे हैं और ग्लोबल डिमांड भी बंट गई है।
ग्लोबल मार्केट में भारत की पोजीशन
भारत का टेक्सटाइल सेक्टर, जिसका एक्सपोर्ट $37 बिलियन (FY2025-26) अनुमानित है, ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। वियतनाम अपने FTAs और टेक्नोलॉजी में निवेश के दम पर आगे बढ़ रहा है और 2026 तक $50 बिलियन एक्सपोर्ट का लक्ष्य रखता है। बांग्लादेश EU मार्केट में बड़ा प्लेयर बना हुआ है, लेकिन ज्यादा वॉल्यूम के बावजूद कीमतों को लेकर दबाव में है। चीन के ओवरऑल टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में 2025 में 2.42% यानी $293.77 बिलियन की गिरावट आई, लेकिन वह अभी भी टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स में मजबूत है और 2026 के लिए $285 बिलियन का लक्ष्य बनाए हुए है। वहीं, भारत का 2025 कैलेंडर ईयर का एक्सपोर्ट $37.54 बिलियन रहा, जो नए मार्केट्स और रेडीमेड गारमेंट्स जैसे सेगमेंट्स में ग्रोथ के कारण स्थिर रहा। लेकिन, जनवरी के आंकड़े पिछले साल के मुकाबले गिरावट दिखाते हैं, जबकि दिसंबर 2025 में ग्रोथ अच्छी थी।
मैक्रोइकॉनॉमिक और सेक्टरल ट्रेंड्स
दुनिया भर में मैन-मेड फाइबर (MMF) का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। ग्लोबल फाइबर प्रोडक्शन का करीब 75% सिंथेटिक फाइबर से होता है और यही यार्न व फैब्रिक ट्रेड में हावी है। भारत में कॉटन सेगमेंट मजबूत है, लेकिन ग्लोबल ट्रेंड MMF की तरफ है। यह एक ज़रूरी बदलाव है क्योंकि जनवरी में भारत के मैन-मेड यार्न, फैब्रिक और मेड-अप्स सेगमेंट में 1.01% की मामूली ग्रोथ दिखी, जबकि कॉटन-बेस्ड प्रोडक्ट्स में गिरावट आई।
टेक्निकल टेक्सटाइल्स (Technical Textiles) एक बड़ा ग्रोथ एरिया बनकर उभर रहा है, जिसका इंडियन मार्केट 2026 तक $45 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और PM MITRA पार्क्स जैसी पहलों से MMF और टेक्निकल टेक्सटाइल्स को सपोर्ट कर रही है ताकि मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाई जा सके। भारत का ओवरऑल टेक्सटाइल मार्केट 2025 में लगभग $152.40 बिलियन का था और 2034 तक 3.83% की एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ने की उम्मीद है। लिस्टेड कंपनियों का P/E रेशियो 14.35x से 40x या उससे ज़्यादा तक हो सकता है, जो कंपनी पर निर्भर करता है।
सरकारी नीतियां
भारत एक्सपोर्ट इंसेंटिव प्रोग्राम्स को बढ़ाने और FTAs पर बातचीत करने जैसी कई पॉलिसी अपना रहा है, जैसे यूके के साथ FTA। यूनियन बजट 2025-26 में मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल्स को ₹5,272 करोड़ का बड़ा फंड आवंटित किया गया है, जिसमें 5 साल का कॉटन मिशन और टेक्निकल टेक्सटाइल्स के लिए कुछ लूम्स पर ड्यूटी में छूट शामिल है। सरकार MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) को एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (EPM) और क्रेडिट गारंटी स्कीम फॉर एक्सपोर्टर्स के ज़रिए सपोर्ट कर रही है।
⚠️ एक्सपोर्टर्स के लिए क्या हैं चुनौतियाँ?
अमेरिकी टैरिफ में कमी के बावजूद, भारत के टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पुराने हाई टैरिफ का असर अभी भी है, जिसने ग्लोबल बायर्स को अपनी सोर्सिंग स्ट्रैटेजी बदलने पर मजबूर किया है। वे अब 'सिंगल कंट्री डिपेंडेंसी' से हटकर ज़्यादा फ्लेक्सिबल और डाइवर्सिफाइड सप्लाई चेन चाहते हैं। इस वजह से तुरंत बड़ा उछाल आने की उम्मीद कम है, खासकर तब जब वियतनाम जैसे कॉम्पिटिटर्स अपने FTAs का इस्तेमाल करके मार्केट्स में बेहतर एक्सेस पा रहे हैं।
बांग्लादेश के एक्सपोर्ट में दिखी कीमतों में कमी (price compression) इस बात का इशारा है कि ग्लोबल लेवल पर प्राइस वॉर चल रही है, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स को भी निपटना होगा। मैन-मेड फाइबर में भले ही ग्रोथ दिख रही हो, लेकिन कॉटन-बेस्ड प्रोडक्ट्स की ग्लोबल डिमांड कम हो रही है, जो भारत के पारंपरिक मजबूत पक्ष के लिए एक चुनौती है। जूट (jute) और हस्तशिल्प (handicrafts) जैसे सेगमेंट्स में आई भारी गिरावट ने संरचनात्मक (structural) समस्याओं को उजागर किया है। कॉटन रॉ मटेरियल और वेस्ट के इम्पोर्ट में बढ़ोतरी घरेलू इनपुट की बढ़ती डिमांड तो दिखाती है, पर अगर ग्लोबल डिमांड कमज़ोर रही या प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो यह एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस में सीधे तौर पर तब्दील नहीं होगा। एक्सपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अमेरिकी मार्केट पर निर्भर है, जो कि एक कमजोरी बनी हुई है, भले ही डाइवर्सिफिकेशन के प्रयास चल रहे हों।
आगे का रास्ता कैसा?
इंडस्ट्री एनालिस्ट्स 2026 के लिए डिमांड में धीरे-धीरे सुधार की उम्मीद कर रहे हैं। भारत का $194 बिलियन का डोमेस्टिक मार्केट कुछ स्टेबिलिटी दे सकता है। हालांकि, ग्लोबल डिमांड में रिकवरी धीमी रहने का अनुमान है। सरकार की मदद से टेक्निकल टेक्सटाइल्स और MMF सेगमेंट्स को ग्रोथ का बड़ा जरिया माना जा रहा है। 2030-31 तक $100 बिलियन एक्सपोर्ट के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए, मौजूदा फ्लैट एक्सपोर्ट ट्रेंड से आगे बढ़कर तेज़ ग्रोथ दिखानी होगी। इसके लिए कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाना और स्ट्रेटेजिक FTAs के ज़रिए मार्केट एक्सेस बनाए रखना ज़रूरी होगा।