यह ग्रोथ उम्मीद से कहीं बेहतर है, क्योंकि पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि निर्यात में गिरावट आ सकती है। मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल्स (Ministry of Textiles) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में यह आंकड़ा ₹3,09,859.3 करोड़ था। इससे पता चलता है कि वैश्विक मांग बनी हुई है, लेकिन निर्यात के असली मूल्य (Value) और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी प्रतिस्पर्धा (Competitiveness) को लेकर गहरी चिंताएं भी हैं।
इस बार वैल्यू-एडेड कैटेगरीज़ ने निर्यात को बढ़ावा दिया। रेडी-मेड गारमेंट्स (RMG), जो हमारा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट आइटम है, में 2.9% की बढ़ोतरी हुई और यह ₹1,39,349.6 करोड़ तक पहुंच गया। मैन-मेड टेक्सटाइल्स में 3.6% की बढ़त देखी गई, वहीं हैंडीक्राफ्ट्स (Handicrafts) ने तो 6.1% की सबसे तेज रफ्तार से ₹15,855.1 करोड़ का निर्यात किया। पारंपरिक सेगमेंट जैसे कॉटन यार्न और फैब्रिक्स में मामूली 0.4% की ग्रोथ रही। भारतीय टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स अब 120 से ज्यादा देशों में पहुंच रहे हैं, जिनमें यूएई (UAE), यूके (UK) और जर्मनी (Germany) जैसे बाजारों में खास ग्रोथ देखी गई।
लेकिन, असली तस्वीर थोड़ी अलग है। भारत का 2.1% ग्रोथ रेट वियतनाम (Vietnam) और बांग्लादेश (Bangladesh) जैसे प्रतिस्पर्धियों से काफी पीछे है, जिन्होंने अपने टेक्सटाइल एक्सपोर्ट्स में कहीं ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ोतरी हासिल की है। अमेरिका (USA) की ओर से लगाए गए भारी टैरिफ, जो कुछ प्रोडक्ट्स पर 50% तक हैं, भारतीय सामानों को महंगा बना रहे हैं। इसके अलावा, ग्लोबल इन्फ्लेशन, एनर्जी और लॉजिस्टिक्स की बढ़ी हुई लागत, और बढ़ती मजदूरी ने प्रोडक्शन कॉस्ट को बढ़ाया है और प्रॉफिट मार्जिन को कम किया है।
कुछ रिपोर्टें यह भी संकेत दे रही हैं कि रुपये में एक्सपोर्ट वैल्यू बढ़ने के बावजूद, हमें डॉलर में कमाई कम हो सकती है, जो हमारी प्राइसिंग पावर (Pricing Power) में कमी का इशारा है। अलग-अलग सेगमेंट्स में ओवरऑल गिरावट की खबरें भी अंदरूनी कमजोरियों को दर्शाती हैं। स्ट्रक्चरल डिसएडवांटेजेस भी कॉम्पिटिटिवनेस पर असर डाल रहे हैं। वियतनाम और बांग्लादेश के विपरीत, जिन्हें प्रमुख बाजारों में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) के जरिए लगभग ड्यूटी-फ्री एक्सेस (Duty-free access) मिलता है, भारत को अहम इकोनॉमिक ब्लॉक्स में ऊंचे टैरिफ का सामना करना पड़ता है। मैन्युफैक्चरिंग बेस का बिखरा होना और मैटेरियल्स पर विशेष ड्यूटी स्ट्रक्चर भी उत्पादन को मजबूत एक्सपोर्ट वैल्यू में बदलने की क्षमता को सीमित करते हैं।
इन चुनौतियों के बावजूद, इस सेक्टर का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है। अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 तक बाजार का आकार $190 बिलियन और 2030 तक $350 बिलियन तक पहुंच जाएगा। सरकार प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और इंडस्ट्रियल पार्क्स के विकास जैसी पहलों से उद्योग को समर्थन दे रही है। यूके और यूरोपीय संघ (EU) सहित अन्य देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) पर प्रगति से मार्केट एक्सेस बेहतर होने और टैरिफ के नुकसान को कम करने की उम्मीद है। सेक्टर की भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सरकारी समर्थन वैल्यू एडिशन और ग्लोबल मार्केट शेयर में कैसे तब्दील होता है।
