भारतीय जूट उद्योग को बचाने के लिए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। अब बांग्लादेश और नेपाल से आने वाले जूट पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी को 'मिल-स्पेसिफिक' (mill-specific) दरों में बदल दिया गया है, ताकि विदेशी सब्सिडी वाली सस्ती प्रतिस्पर्धा को रोका जा सके।
विदेशी प्रतिस्पर्धा पर लगाम
वित्त मंत्रालय ने बांग्लादेश और नेपाल से आने वाले जूट उत्पादों, जैसे यार्न, हेसियन और बोरियों पर ड्यूटी के नियमों को और कड़ा कर दिया है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज (DGTR) की मिड-टर्म समीक्षा में सामने आया था कि पिछले 4 सालों में इन देशों से जूट का आयात तेजी से बढ़ा है। अब सरकार ब्लैंकेट ड्यूटी के बजाय विदेशी एक्सपोर्टर्स की प्राइसिंग के आधार पर अलग-अलग मिलों के लिए अलग-अलग ड्यूटी तय करेगी।
नई रणनीति: सब्सिडी पर प्रहार
जो विदेशी एक्सपोर्टर्स जांच प्रक्रिया में सहयोग नहीं कर रहे हैं, उन पर अब सख्त पेनल्टी लगाई जाएगी। इसके अलावा, DGTR ने पहली बार 'काउंटरवेलिंग ड्यूटी' (Countervailing Duty) की सिफारिश की है। जांच में पता चला है कि पड़ोसी देशों के कुछ एक्सपोर्टर्स को वहां की सरकारों से कैश इंसेंटिव और टैक्स में छूट मिल रही थी, जिसे ग्लोबल ट्रेड नियमों के तहत गलत माना गया है।
घरेलू कंपनियों के लिए क्या हैं मायने?
यह फैसला Gloster Ltd, Cheviot Company और Ludlow Jute & Specialities जैसी घरेलू कंपनियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। सस्ती विदेशी सप्लाई के कारण इन कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर लंबे समय से दबाव था। अब आयात में कमी आने से घरेलू जूट कंपनियों को बाजार में अपनी कीमतें स्थिर रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, निवेशकों को यह याद रखना चाहिए कि जूट सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी कच्चे जूट की कीमतों और 'जूट पैकेजिंग मैटेरियल एक्ट' जैसे सरकारी नियमों पर भी निर्भर करती है।
निवेशकों की नजर कहां हो?
फिलहाल मार्केट की नजर सरकार की ओर से आने वाले 'काउंटरवेलिंग ड्यूटी' के फाइनल नोटिफिकेशन पर है। यह अतिरिक्त सुरक्षा कवच आने वाले समय में घरेलू कंपनियों का मार्केट शेयर बढ़ाने में मदद कर सकता है।
