इंडस्ट्री का बड़ा दांव: वॉल्यूम से वैल्यू की ओर?
भारतीय फुटवियर इंडस्ट्री, जो कि दुनिया में प्रोडक्शन के मामले में एक बड़ी ताकत है, अब सिर्फ वॉल्यूम (volume) पर फोकस करने के बजाय वैल्यू-ड्रिवन मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ रही है। इसके लिए 'टेक्निकल टेक्सटाइल्स' को इंटीग्रेट किया जा रहा है। भारत सालाना करीब 24 अरब पेयर जूते बनाता है, जो दुनिया के कुल प्रोडक्शन का लगभग 13% है, लेकिन ग्लोबल एक्सपोर्ट्स में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ 1.8% से 2.2% है। यह बड़ी खाई पाटने की तैयारी है। साथ ही, ग्लोबल मार्केट में 86% नॉन-लेदर फुटवियर की मांग को देखते हुए, भारत एडवांस मटेरियल और फंक्शनैलिटीज को अपनाकर खुद को सिर्फ एक प्रोड्यूसर नहीं, बल्कि हाई-टेक फुटवियर में एक इनोवेटर के तौर पर स्थापित करना चाहता है।
परफॉरमेंस, सस्टेनेबिलिटी और ग्रोथ का नया मंत्र
टेक्निकल टेक्सटाइल्स को अपनाने से भारतीय फुटवियर का चेहरा बदलने वाला है। इससे जूतों में कम्फर्ट, ड्यूरेबिलिटी (durability) और परफॉरमेंस बढ़ेगी, जो आज के कंज्यूमर की हल्की, रेस्पॉन्सिव और एडवांस्ड शूज़ की मांग को पूरा करेगा। यह ग्लोबल ट्रेंड के अनुरूप है, खासकर स्पोर्ट्स शूज़ सेगमेंट में, जिसके अगले कुछ सालों में तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। भारतीय स्नीकर मार्केट अकेले 2030 तक लगभग दोगुना होने का अनुमान है। सस्टेनेबिलिटी (sustainability) भी एक बड़ा फैक्टर है, जहां रीसाइकल्ड PET और बायोडिग्रेडेबल फाइबर जैसे मटेरियल का इस्तेमाल बढ़ेगा। इससे भारत इको-कॉन्शियस प्रोडक्ट्स की बढ़ती ग्लोबल डिमांड का फायदा उठा सकेगा। मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल्स 'स्मार्ट, सस्टेनेबल एंड सीमलेस' जैसी स्ट्रैटेजी पर काम कर रही है, जिसमें कस्टमाइजेशन के लिए डिजिटल टूल्स और 3D निटिंग जैसी वेस्ट-रिड्यूसिंग तकनीकें शामिल हैं। भारत का डोमेस्टिक फुटवियर मार्केट, जिसका वैल्यू 2025 तक $20 बिलियन से ऊपर जाने का अनुमान है, इस हाई-वैल्यू प्रोडक्ट शिफ्ट को सपोर्ट कर रहा है।
एक्सपोर्ट्स में पिछड़ना और मुकाबला
पिछले एक दशक में भारत के फुटवियर एक्सपोर्ट्स में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है, यह औसतन 25-26 करोड़ पेयर के आसपास ही रहे हैं। इसकी तुलना में वियतनाम (Vietnam) और इंडोनेशिया (Indonesia) जैसे देशों ने ट्रेड एग्रीमेंट्स और पॉलिसी रिफॉर्म्स के दम पर अपनी ग्लोबल मार्केट हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई है। जबकि चीन (China) प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट्स में टॉप पर है, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसी कंट्रीज़ ग्लोबल ब्रांड्स की सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन की वजह से फायदे में रही हैं। भारत की एक्सपोर्ट हिस्सेदारी 1.8% से 1.9% पर अटकी हुई है। इसके पीछे इंडस्ट्री का बिखरा हुआ स्ट्रक्चर ( 70% से ज़्यादा अनऑर्गनाइज्ड), एडवांस्ड रॉ मटेरियल के लिए इम्पोर्ट पर निर्भरता और अमेरिका व यूरोप जैसे बड़े मार्केट्स में टैरिफ की दिक्कतें शामिल हैं। प्रोडक्टिविटी भी कम है; जहां भारतीय वर्कर्स दिन में 4-5 पेयर जूते बनाते हैं, वहीं ग्लोबल एवरेज 17-20 पेयर प्रति दिन है। सिर्फ फुटवियर सोल मटेरियल का ग्लोबल मार्केट 2030 तक $30 बिलियन से ऊपर पहुंचने का अनुमान है, जो मटेरियल इनोवेशन के महत्व को दिखाता है, जहां टेक्निकल टेक्सटाइल्स एक बड़ा कॉम्पिटिटिव एज दे सकता है।
आगे की राह में चुनौतियां
टेक्निकल टेक्सटाइल्स की ओर इस स्ट्रेटेजिक शिफ्ट के बावजूद, चुनौतियां बनी हुई हैं। भारतीय फुटवियर इंडस्ट्री में 70% से ज़्यादा प्रोडक्शन अभी भी अनऑर्गनाइज्ड है, जिससे क्वालिटी कंट्रोल और ग्लोबल कॉम्पिटिशन के लिए स्केलेबिलिटी (scalability) सुनिश्चित करना मुश्किल हो रहा है। एडवांस्ड टेक्निकल टेक्सटाइल्स के लिए इम्पोर्टेड रॉ मटेरियल पर ज़्यादा निर्भरता सप्लाई चेन में रुकावटों और प्राइस वोलेटिलिटी का खतरा पैदा कर सकती है। वहीं, ग्लोबल बायर्स इनपुट कॉस्ट बढ़ने और बांग्लादेश (Bangladesh) जैसे उभरते खिलाड़ियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते भारतीय एक्सपोर्टर्स से 20-25% तक डिस्काउंट की मांग कर रहे हैं। अप्रैल 2025 से लागू होने वाला ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) सर्टिफिकेशन, जिसका मकसद क्वालिटी सुधारना है, छोटे मैन्युफैक्चरर्स के लिए कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ा सकता है और शिपमेंट में देरी का कारण बन सकता है। साथ ही, ग्लोबल पहचान वाले मजबूत डोमेस्टिक ब्रांड्स की कमी और नकली उत्पादों (counterfeiting) का बढ़ना, भारत के लिए हाई-वैल्यू मार्केट सेगमेंट को टारगेट करने और एक अलग ग्लोबल पहचान बनाने में बाधा डाल रहा है।
सरकारी सपोर्ट और भविष्य की उम्मीदें
मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल्स के नेशनल टेक्निकल टेक्सटाइल मिशन (NTTM) और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स, टेक्निकल टेक्सटाइल्स में इनोवेशन और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने में सरकार की प्रतिबद्धता दिखाती हैं। भारतीय टेक्निकल टेक्सटाइल्स मार्केट 2027 तक $23.3 बिलियन और ओवरऑल फुटवियर मार्केट 2032 तक $45 बिलियन से ऊपर पहुंचने का अनुमान है। टेक्निकल टेक्सटाइल्स को इंटीग्रेट करना ग्रोथ का एक स्पष्ट रास्ता दिखाता है। स्थापित मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स और R&D पर फोकस करके, भारत एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ा सकता है, हाई-वैल्यू एम्प्लॉयमेंट क्रिएट कर सकता है और फुटवियर इंडस्ट्री को स्पेशलाइज्ड, परफॉरमेंस-ड्रिवन ग्लोबल मार्केट्स में लीडर बना सकता है।
