अस्थायी राहत, RoDTEP दरों की बहाली
सरकार ने 23 फरवरी 2026 से 31 मार्च 2026 तक RoDTEP दरों को पूरी तरह से बहाल कर दिया है। यह नीतिगत कदम पहले की कटौती को पलट देता है और बढ़ते फ्रेट कॉस्ट (freight costs) व पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष (West Asia conflict) से जुड़े व्यापारिक जोखिमों के जवाब में उठाया गया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) का कहना है कि यह निर्णय समय पर सहायता प्रदान करने के लिए है, क्योंकि शिपिंग मार्गों में आई रुकावटों ने लॉजिस्टिक्स लागत (logistics costs) को काफी बढ़ा दिया है। टेक्सटाइल जैसे सेक्टर, जो अक्सर पतले मार्जिन पर काम करते हैं, के लिए यह बहाली तत्काल नुकसान से बचने के लिए जरूरी मानी जा रही है।
वैश्विक संघर्षों से बढ़ी शिपिंग लागत, एक्सपोर्ट पर दबाव
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत की एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस (export competitiveness) पर सीधा असर डाल रहा है। एशिया-पश्चिम एशिया मार्गों पर कंटेनर फ्रेट रेट्स (container freight rates) में भारी बढ़ोतरी हुई है, कुछ मार्गों पर तो यह दो से तीन गुना तक बढ़ गए हैं। वॉर-रिस्क प्रीमियम (war-risk premiums) चार गुना हो गए हैं, और बंकर फ्यूल की कीमतें भी चढ़ी हैं, जिससे एक्सपोर्टर्स की परिचालन लागत (operational costs) बढ़ गई है। फरवरी में अमेरिका, यूके, यूएई और सऊदी अरब जैसे प्रमुख बाजारों में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स (merchandise exports) में गिरावट देखी गई है, जिससे ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) बढ़ा है।
एक्सपोर्ट इंसेंटिव्स में पिछड़ रहा भारत
हालांकि RoDTEP जैसी नीतियां हैं, लेकिन भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए एक बड़ी चिंता यह है कि वे ग्लोबल प्लेयर्स के मुकाबले कहां खड़े हैं। वियतनाम, बांग्लादेश, तुर्की और चीन जैसे देश मजबूत और स्थिर रिमिशन मैकेनिज्म (remission mechanisms) से लाभान्वित होते हैं, जो उन्हें लागत का फायदा देते हैं। इंडस्ट्री बॉडीज (industry bodies) का कहना है कि लागत में मामूली सी भी बढ़ोतरी होने पर ऑर्डर डायवर्ट हो सकते हैं, खासकर टेक्सटाइल और गारमेंट जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स (labor-intensive sectors) में। RoDTEP का मकसद एम्बेडेड टैक्सेज (embedded taxes) को रिफंड करना है, लेकिन इसकी अस्थायी प्रकृति और पिछली एडजस्टमेंट्स (adjustments) अनिश्चितता पैदा करती हैं, जो प्रतिस्पर्धियों की स्थिर प्रोत्साहन प्रणालियों (stable incentive systems) से अलग है।
एक्सपोर्टर्स को स्थिर मदद चाहिए, न कि तदर्थ उपाय
सरकार की अस्थायी योजनाओं पर लगातार निर्भरता एक बड़ी कमजोरी को दर्शाती है: भारतीय एक्सपोर्टर्स, खासकर MSMEs, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए सरकारी सहायता पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। MSMEs, जो भारत के कुल निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, उनके पास वित्तीय कुशन (financial cushion) बहुत कम होता है, जिससे वे बढ़ती लागतों और बदलती नीतियों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं। RoDTEP की वर्तमान बहाली केवल मार्च 2026 तक के लिए एक अल्पकालिक उपाय है। इसके भविष्य पर अनिश्चितता बनी हुई है, खासकर बजट कटौती की पिछली बातों को देखते हुए। यह निर्भरता भारतीय फर्मों को स्थिर, दीर्घकालिक निर्यात प्रोत्साहन (long-term export incentives) वाले प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले नुकसान में डालती है।
उद्योग की मांग: पूर्वानुमानित एक्सपोर्ट नीतियां
कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) और फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (FIEO) जैसे उद्योग हितधारकों (industry stakeholders) ने सरकार से RoDTEP योजना को बिना किसी निश्चित समय-सीमा के आगे बढ़ाने की मांग की है। उनका तर्क है कि एक्सपोर्ट ऑर्डर के लिए लंबे लीड टाइम (lead times), जो आमतौर पर छह महीने होते हैं, के लिए नीतिगत पूर्वानुमान (policy predictability) जरूरी है। जबकि सरकार ने तत्काल संकटों पर प्रतिक्रिया दिखाई है, मुख्य लक्ष्य एक स्थिर, दीर्घकालिक नीति बनाना है। इसके बिना, भारत अपने अधिक विश्वसनीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बाजार हिस्सेदारी (market share) खोने का जोखिम उठा सकता है।