केंद्र सरकार ने कॉटन इम्पोर्ट पर मिलने वाली कस्टम ड्यूटी छूट को **31 दिसंबर 2026** तक बढ़ा दिया है। इस फैसले से टेक्सटाइल कंपनियों की इनपुट कॉस्ट कम होगी और उन्हें रॉ मटेरियल की लगातार सप्लाई मिलती रहेगी।
वित्त मंत्रालय ने कॉटन इम्पोर्ट पर कस्टम ड्यूटी की छूट को 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ाने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। यह कदम टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर के लिए एक स्ट्रैटेजिक बफर की तरह काम करेगा, जो इस साल कच्चे माल की अस्थिर कीमतों से जूझ रहा था। ड्यूटी फ्री स्टेटस बरकरार रहने से कंपनियों को बिना किसी अतिरिक्त टैक्स के कॉटन मंगाने की सहूलियत मिलेगी, जो उनकी प्रोडक्शन लागत का एक बड़ा हिस्सा होता है।
मुनाफे पर क्या होगा असर?
टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स, खास तौर पर स्पिनिंग मिल्स और गारमेंट एक्सपोर्टर्स के लिए कच्चा माल सबसे बड़ा वेरिएबल कॉस्ट है। जब घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है, तो कंपनियों के मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ता है। इस पॉलिसी से कंपनियों को अब एक स्पष्ट कॉस्ट स्ट्रक्चर मिलेगा। विशेष रूप से स्मॉल और मीडियम साइज एंटरप्राइजेज (SMEs) के लिए यह काफी मददगार है, जो अक्सर कीमत में आए बड़े बदलावों से खुद को सुरक्षित (hedge) नहीं कर पाते।
इंडस्ट्री और किसानों के बीच संतुलन
सरकार का यह फैसला टेक्सटाइल इंडस्ट्री को ग्लोबल मार्केट में वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से मुकाबला करने में मदद करेगा। हालांकि, यह कदम किसानों के हितों के साथ एक संतुलन बनाने की कोशिश भी है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इम्पोर्टेड कॉटन बहुत सस्ता न हो जाए, जिससे घरेलू किसानों की आय पर असर न पड़े।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को अब कंपनियों की अगली तिमाही की मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए। मार्जिन में सुधार इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कीमतों के अंतर (spread) का कितना फायदा उठा पाती हैं। अगर ग्लोबल प्राइसेस फेवरेबल रहीं, तो टेक्सटाइल कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में बेहतर उछाल देखने को मिल सकता है।
