भारतीय गारमेंट इंडस्ट्री एक बड़ी मुसीबत में है। सप्लाई चेन की गड़बड़ियां और फैक्ट्रियों की कम प्रोडक्टिविटी के चलते देश हर साल करीब $7 बिलियन के एक्सपोर्ट रेवेन्यू से चूक रहा है।
प्रोडक्शन में कहां हो रही है चूक?
भारत की गारमेंट इंडस्ट्री को ग्लोबल लीडर बनाने का सपना एक बड़ी अड़चन का सामना कर रहा है। वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट बताती है कि देश हर साल लगभग $7 बिलियन के एक्सपोर्ट रेवेन्यू से हाथ धो रहा है। ये नुकसान केवल ऊंची लागत या बाहरी व्यापार बाधाओं के कारण नहीं है, बल्कि अंदरूनी ऑपरेशनल इनएफिशिएंसी (operational inefficiencies) इसका मुख्य कारण है।
फैक्ट्रियों में प्रोडक्टिविटी का हाल
समस्या की जड़ फैक्ट्रियों के मैनेजमेंट में है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, कई गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की सिलाई (sewing) की एफिशिएंसी केवल 58% से 70% के बीच है। इतना ही नहीं, फैक्ट्रियां समय पर आर्डर पूरा करने में भी संघर्ष कर रही हैं, ऑन-टाइम डिलीवरी रेट 60% से 80% तक ही है। जब आर्डर में देरी होती है, तो एक्सपोर्टर्स को समय पर उत्पादों को खरीदारों तक पहुंचाने के लिए एयर-फ्रेट (airfreight) का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। ये अतिरिक्त लागत सीधे मुनाफे को कम करती है, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए ग्लोबल मार्केट में कीमत पर मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है।
रॉ मटेरियल का एक्सपोर्ट या फिनिशड कपड़ों का?
एक और बड़ी चिंता फिनिशड कपड़ों के बजाय केवल रॉ फैब्रिक (raw fabric) बेचने पर निर्भरता है। हालांकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टेक्सटाइल उत्पादक है, लेकिन इस आउटपुट का एक बड़ा हिस्सा – अनुमानित 35% से 45% – रॉ फैब्रिक के रूप में एक्सपोर्ट किया जाता है। फैब्रिक को हाई-वैल्यू गारमेंट में बदलने के बजाय एक्सपोर्ट करने से, भारतीय कंपनियां फाइनल मैन्युफैक्चरिंग स्टेज से होने वाले मुनाफे से चूक जाती हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर टेक्सटाइल मिल्स और गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स मिलकर काम करें, तो वे एक ज्यादा अनुमानित प्रोडक्शन साइकिल बना सकते हैं और ज्यादा वैल्यू कैप्चर कर सकते हैं।
कंपीटिशन और ट्रेड की चुनौतियाँ
ये चुनौतियां केवल अंदरूनी सप्लाई चेन तक ही सीमित नहीं हैं। बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग हब ऐतिहासिक रूप से लेबर प्रोडक्टिविटी और ज्यादा अनुकूल व्यापारिक शर्तों के कारण बढ़त बनाए हुए हैं। हालांकि भारत और यूके के बीच व्यापार समझौते से कुछ मदद की उम्मीद है, लेकिन इंडस्ट्री लीडर्स का कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ व्यापक व्यापार समझौते भारत के लिए ग्लोबल स्तर पर मुकाबला करने के लिए आवश्यक हैं।
निवेशकों के लिए, इस सेक्टर का मुख्य आकर्षण यह देखना है कि क्या कंपनियां हाई-वैल्यू उत्पादों की ओर बढ़ सकती हैं और अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार कर सकती हैं। फैक्ट्रियों में भारी नए कैपिटल खर्च पर बहुत अधिक निर्भर हुए बिना गारमेंट प्रोडक्शन बढ़ाने की क्षमता एक पॉजिटिव संकेत है। हालांकि, इस सेक्टर के लिए अगली महत्वपूर्ण अपडेट यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी ऑन-टाइम डिलीवरी मेट्रिक्स में कितना सुधार कर पाती हैं और क्या वे ग्लोबल कंपीटिशन के दबाव को कम करने के लिए हाई-मार्जिन फिनिशड अपैरल एक्सपोर्ट्स की ओर सफलतापूर्वक कदम बढ़ा पाती हैं।
