केंद्र सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर में नई जान फूंकने के लिए ₹40,000 करोड़ की 'TEEM' स्कीम लॉन्च की है। इस योजना का मकसद अगले 5 सालों में मैन्युफैक्चरिंग हब को मॉडर्न बनाना और 2030 तक सालाना एक्सपोर्ट को $100 बिलियन के पार पहुंचाना है।
भारत सरकार ने टेक्सटाइल एक्सपेंशन एंड एम्प्लॉयमेंट (TEEM) स्कीम के जरिए एक बड़े निवेश का आगाज किया है। इस ₹40,000 करोड़ के फंड का इस्तेमाल तिरुपुर, सूरत, कोयंबटूर और लुधियाना जैसे प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग सेंटर्स को अपग्रेड करने के लिए किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य अपनी प्रोडक्शन एफिशिएंसी को बढ़ाकर वैश्विक बाजार में भारत को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना है।
ग्लोबल एक्सपोर्ट में बड़ी छलांग की तैयारी
यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत जल्द ही यूके (UK) और यूरोपीय संघ (European Union) के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट करने जा रहा है। वर्तमान में बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले भारतीय एक्सपोर्टर्स को अधिक टैरिफ का सामना करना पड़ता है। इस निवेश से आधुनिक मशीनरी और सस्टेनेबिलिटी मानकों को पूरा करने वाले प्लांट लगाए जाएंगे, ताकि यूरोपीय खरीदारों की सख्त जरूरतों को पूरा किया जा सके।
इन्फ्रास्ट्रक्चर और अनुपालन पर जोर
नई स्कीम केवल मशीनों तक सीमित नहीं है। इसमें वर्कर हाउसिंग और रिसर्च फैसिलिटीज पर भी ध्यान दिया जाएगा। साथ ही, वॉटर मैनेजमेंट और वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट्स पर जोर दिया जा रहा है, जो वैश्विक कंपनियों की पहली शर्त होती है। Welspun Living, Vardhman Textiles और Gokaldas Exports जैसी कंपनियों के लिए यह बदलाव ऑपरेशनल कॉस्ट को घटाने और बाधाओं को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है।
चुनौतियां और जोखिम
निवेशकों को यह समझना होगा कि इस सेक्टर में कच्चा माल, जैसे कॉटन और पॉलिएस्टर की कीमतों में भारी अस्थिरता रहती है। इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण और सरकारी प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन (execution) में देरी का इतिहास रहा है। $100 बिलियन का एक्सपोर्ट टारगेट काफी आक्रामक है, जिसे पूरा करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की रफ्तार तेज होनी चाहिए। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि सरकारी गाइडलाइंस क्या आती हैं और कंपनियां इस मौके का कितना फायदा उठा पाती हैं।
