इंपोर्ट ड्यूटी में छूट से कंपनियों को कैसे मिलेगी राहत?
सरकार ने कपास पर लगने वाले 11% कस्टम ड्यूटी को फिलहाल माफ कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर सप्लाई और डिमांड में भारी अंतर से जूझ रहा है। 2025-26 सीजन में घरेलू कपास उत्पादन 291 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जो कि 328-330 लाख गांठ की मांग से काफी कम है। इस कमी को पूरा करने के लिए इंपोर्टेड कपास पर निर्भरता बढ़ गई है। इंपोर्ट ड्यूटी हटाने से इंपोर्टेड कपास की लागत अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के करीब आ जाएगी, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स का कॉम्पिटिटिव एज (competitive edge) बना रहेगा, जो अभी ड्यूटी-फ्री रॉ मटेरियल का इस्तेमाल करने वाले बांग्लादेश जैसे देशों के मैन्युफैक्चरर्स से पिछड़ रहे थे।
जानकारों की राय: राहत अस्थायी, चुनौतियां बरकरार
कपास पर इंपोर्ट ड्यूटी में छूट से कंपनियों को फौरी तौर पर राहत तो मिलेगी, लेकिन इसका असर सिर्फ 5 महीने की अवधि तक सीमित रहेगा। इससे पहले भी 2025 के अंत और मध्य में ऐसी अस्थायी छूट दी गई थी, लेकिन ये उपाय भारतीय कपास उत्पादन की पुरानी उत्पादकता (productivity) समस्याओं को हल नहीं कर पाए। भारत की लिंट प्रोडक्टिविटी (lint productivity) अभी भी वैश्विक औसत से काफी कम है, जिसे सरकार 5 साल की एक प्रोडक्टिविटी मिशन के ज़रिए सुधारने की कोशिश कर रही है। Vardhman Textiles, KPR Mill, और Arvind Ltd जैसी कंपनियों को तुरंत अंतरराष्ट्रीय रेट पर कच्चा माल मिलने का फायदा होगा। लेकिन, कंपनी की ऑपरेशनल सस्टेनेबिलिटी (operational sustainability) ग्लोबल ट्रेड और सप्लाई चेन पर निर्भर करेगी।
लंबी अवधि के रिस्क और चुनौतियां
इस ड्यूटी माफी से मिली खुशी के बीच कुछ बड़े स्ट्रक्चरल रिस्क (structural risks) भी हैं। 2026 की शुरुआत में टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में गिरावट देखी गई थी, जिसकी मुख्य वजह ग्लोबल डिमांड में कमी और अमेरिका जैसे प्रमुख बाजारों में भारी टैरिफ (tariff) हैं। इंपोर्ट ड्यूटी में तत्काल राहत के अलावा, मैन्युफैक्चरर्स को यूरोपीय यूनियन के कड़े ESG और सस्टेनेबिलिटी (sustainability) नियमों का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए बड़े कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) की ज़रूरत होगी। बार-बार ऐसी अस्थायी छूटों से पॉलिसी में अनिश्चितता (policy uncertainty) बनी रहती है, जिससे कंपनियों की लॉन्ग-टर्म प्लानिंग (long-term planning) मुश्किल हो जाती है। अगर घरेलू कपास की कीमतें कम नहीं हुईं या जियोपॉलिटिकल (geopolitical) वजहों से शिपिंग कॉस्ट (shipping cost) बढ़ी रही, तो ड्यूटी माफी का पूरा फायदा कंपनियों के बॉटम लाइन (bottom line) तक नहीं पहुंच पाएगा।
भविष्य की राह
2030 तक $100 बिलियन के एक्सपोर्ट टारगेट (export target) को हासिल करने के लिए, इंडस्ट्री को सिर्फ अस्थायी ड्यूटी छूटों पर निर्भर नहीं रहना होगा। इसके लिए यूके (UK) और ओमान (Oman) जैसे देशों के साथ नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का फायदा उठाना होगा। मौजूदा छूट छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) के लिए एक ज़रूरी कदम है, लेकिन बाज़ार के जानकारों की नज़र इस बात पर है कि क्या सरकार भविष्य में इंपोर्टेड कच्चे माल की लगातार सुरक्षा के लिए एक स्थिर और अनुमानित लॉन्ग-टर्म ट्रेड पॉलिसी (trade policy) लाएगी या फिर बार-बार छोटी-छोटी राहतों पर ही निर्भर रहेगी।
