क्या है यह नया ट्रेड पैक्ट?
बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ एक खास ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) किया है, जिसके तहत अब बांग्लादेश से अमेरिका को भेजे जाने वाले खास तरह के गारमेंट्स (Garments) पर कोई ड्यूटी (Duty) नहीं लगेगी। लेकिन इसकी एक शर्त यह है कि इन कपड़ों को बनाने के लिए अमेरिकी मूल के कॉटन (Cotton) या मैन-मेड फाइबर (Man-made Fiber) का इस्तेमाल करना होगा। यह डेवलपमेंट क्षेत्रीय टेक्सटाइल सप्लाई चेन (Supply Chain) में खरीदारों को लुभाने के तरीके को बदल सकता है।
बांग्लादेश के लिए क्यों अहम है यह डील?
बांग्लादेश का रेडी-मेड गारमेंट (RMG) सेक्टर उसकी इकोनॉमी की रीढ़ है। यह उसके कुल एक्सपोर्ट (Export) कमाई का 80% से ज्यादा हिस्सा लाता है और देश की जीडीपी (GDP) में लगभग 10% का योगदान देता है। वहीं, अमेरिका बांग्लादेश का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है। ऐसे में, जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलना उसके लिए बहुत बड़ी बात है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत, बांग्लादेश को कॉटन और यार्न (Yarn) का एक बड़ा सप्लायर है। बांग्लादेश की गारमेंट इंडस्ट्री की जरूरतें काफी हद तक भारत से पूरी होती हैं। अगर बांग्लादेशी मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) अमेरिकी कॉटन का इस्तेमाल करके ड्यूटी का फायदा उठाना शुरू करते हैं, तो इससे भारतीय कॉटन और यार्न निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। बांग्लादेश, चीन और वियतनाम के साथ भारत के टॉप कॉटन और यार्न बाइंग कंट्रीज में से एक है।
कॉम्पिटिशन और लागत का खेल
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश पहले से ही भारत से ज्यादा कॉम्पिटिटिव (Competitive) है, क्योंकि वहां मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट (Manufacturing Cost) कम है। हालांकि, इस नई डील से बांग्लादेश की कॉम्पिटिटिवनेस और बढ़ सकती है। बांग्लादेश अभी भी रॉ मटेरियल (Raw Material) के लिए आयात पर निर्भर है, खासकर इसलिए क्योंकि उनका अपना स्पिनिंग इंडस्ट्री उतना कॉम्पिटिटिव नहीं है और हालिया लेबर इश्यूज (Labour Issues) ने भी लागत को प्रभावित किया है। अमेरिकी कॉटन को बांग्लादेश ले जाने और उसका स्टॉक रखने में लगने वाली लागत भी इस ड्यूटी एडवांटेज (Duty Advantage) को पूरी तरह से असरदार बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।
भारतीय फर्मों के लिए आगे क्या?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस खबर का शुरुआती असर भारतीय टेक्सटाइल स्टॉक्स (Stocks) पर सेंटिमेंट-ड्रिवन (Sentiment-driven) हो सकता है, न कि तुरंत कमाई पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। ऐसे भारतीय टेक्सटाइल प्लेयर, जो वैल्यू चेन (Value Chain) में इंटीग्रेटेड (Integrated) हैं, यानी यार्न से लेकर फैब्रिक (Fabric) तक सब कुछ खुद बनाते हैं, वे बेहतर स्थिति में होंगे। इनकी कॉस्ट कंट्रोल (Cost Control) और ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) इन्हें इस नई चुनौती से निपटने में मदद करेगी। KPR Mill और Vardhman Textiles जैसी कंपनियाँ इस मामले में बेहतर स्थिति में मानी जा रही हैं। Indo Count Industries, जिसने अमेरिका में पिलो मैन्युफैक्चरिंग में निवेश किया है, वह भी भविष्य में इस स्थिति से निपटने में सक्षम हो सकती है।
