Apparel Export Promotion Council (AEPC) ने केंद्र सरकार से कॉटन यार्न के एक्सपोर्ट को सीमित करने की मांग की है। कॉटन यार्न की कीमतें बढ़कर **₹400** प्रति किलो तक पहुंच गई हैं, जिससे गारमेंट बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव बन गया है।
बढ़ती लागत से मची खलबली
Apparel Export Promotion Council (AEPC) ने केंद्रीय वाणिज्य और कपड़ा मंत्रालय से कॉटन यार्न के एक्सपोर्ट पर तत्काल रोक लगाने की अपील की है। काउंसिल का कहना है कि साल की शुरुआत में जो यार्न ₹250 प्रति किलो मिल रहा था, वह अब ₹400 के स्तर को पार कर गया है। यह तेजी 20s और उससे ऊपर की गिनती वाले धागों में सबसे ज्यादा देखी जा रही है।
एक्सपोर्टर्स बनाम स्पिनिंग मिलें
इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक, ग्लोबल मार्केट में बढ़ती डिमांड और चाइनीज इनपुट पर प्रतिबंध के चलते भारतीय धागे की मांग विदेशों में काफी बढ़ गई है। इससे स्पिनिंग मिलों को तो मुनाफा हो रहा है, लेकिन गारमेंट बनाने वाली कंपनियों के लिए कच्चा माल खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। ये कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत को तुरंत इंटरनेशनल बायर्स पर नहीं डाल पा रही हैं, जिससे उनके मार्जिन पर बुरा असर पड़ रहा है।
सरकार की क्या है रणनीति?
टेक्सटाइल सेक्टर में सप्लाई-डिमांड को संतुलित करने के लिए सरकार ने पहले से ही कच्चे कपास पर 11% इंपोर्ट ड्यूटी छूट दी हुई है, जो अक्टूबर 2026 तक लागू रहेगी। लेकिन AEPC का मानना है कि केवल ड्यूटी छूट काफी नहीं है, और अब एक्सपोर्ट पर रेगुलेटरी कंट्रोल की जरूरत है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
बाजार के जानकारों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर है। अगर सरकार यार्न एक्सपोर्ट पर कोई पाबंदी लगाती है, तो गारमेंट कंपनियों के मार्जिन में सुधार हो सकता है, लेकिन इसका उल्टा असर स्पिनिंग मिलों के मुनाफे पर पड़ सकता है। ऐसे में निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो इंटीग्रेटेड हैं यानी जो खुद धागा बनाती हैं और कपड़े भी, क्योंकि वे इस तरह के प्राइस फ्लक्चुएशन से बेहतर तरीके से बच सकती हैं।
