टेक्सटाइल सेक्टर पर सरकार का फोकस! इंपोर्ट ड्यूटी घटने की मांग, क्या मिलेगी राहत?
Overview
भारत के टेक्सटाइल मंत्रालय ने मटीरियल की बढ़ती कीमतों और ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतों से निपटने के लिए मैन-मेड फाइबर (MMF) इनपुट्स पर इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) घटाने और नैचुरल गैस (Natural Gas) को प्राथमिकता देने की मांग की है।
लागत बढ़ाने वाले ग्लोबल फैक्टर्स से लड़ने की तैयारी
ग्लोबल सप्लाई चेन में चल रही उथल-पुथल और कई देशों में छिड़े संघर्षों का असर भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर भी पड़ रहा है। इन मुश्किलों से निपटने के लिए, टेक्सटाइल मिनिस्ट्री ने कॉटन (Cotton), रेयॉन पल्प (Rayon Pulp) और यार्न (Yarn) जैसे मैन-मेड फाइबर (MMF) पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) को कम करने की पैरवी की है। मिनिस्ट्री एग्रीकल्चर मिनिस्ट्री के साथ कॉटन पॉलिसी पर भी मिलकर काम कर रही है। इसके अलावा, इलास्टोमेरिक फाइबर यार्न (Elastomeric Fibre Yarn) और विस्कोस रेयॉन फिलामेंट यार्न (Viscose Rayon Filament Yarn) पर चल रही एंटी-डंपिंग ड्यूटी (Anti-dumping Duty) जांचों को फिलहाल रोकने का भी आग्रह किया गया है।
ऊर्जा संकट का भी हल तलाश
सरकार से यह भी गुजारिश की गई है कि टेक्सटाइल सेक्टर को नैचुरल गैस (Natural Gas) की सप्लाई में प्राथमिकता दी जाए। हाल ही में लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को LPG सप्लाई बढ़ाने की पहल की गई थी, जिसका लक्ष्य संकट-पूर्व स्तर का 70% हासिल करना है। यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि पॉलिएस्टर फाइबर (Polyester Fibre) बनाने के लिए मुख्य मटीरियल, पॉली-एथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET), की कीमतों और उपलब्धता पर ग्लोबल संघर्षों का सीधा असर पड़ा है। भारतीय कपड़ों के उत्पादन में PET की हिस्सेदारी करीब 40% है।
शिपिंग और एक्सपोर्ट मार्केट की चिंताएं
इंडस्ट्री पर शिपिंग (Shipping) की अतिरिक्त लागतों का बोझ भी बढ़ रहा है। तैयार माल के लिए कंटेनर शिपिंग (Container Shipping) की दरें हाल ही में थोड़ी कम हुई हैं। ड्र्यूरी वर्ल्ड कंटेनर इंडेक्स (Drewry World Container Index) 3% घटकर $2,246 प्रति 40-फुट कंटेनर पर आ गया है, जबकि अप्रैल 16, 2026 तक रॉ मटीरियल शिपिंग लागत को ट्रैक करने वाला बाल्टिक ड्राई इंडेक्स (Baltic Dry Index) 100.08% बढ़कर 2,523 पॉइंट पर पहुंच गया था।
इंडस्ट्री के लिए $1.8 बिलियन के एक्सपोर्ट (Export) यूएई (UAE), सऊदी अरेबिया (Saudi Arabia) और इज़राइल (Israel) जैसे देशों पर निर्भर करते हैं, जो सीधे तौर पर इन ग्लोबल संघर्षों से प्रभावित हो सकते हैं।
पिछला अनुभव और भविष्य की राह
2022 की शुरुआत में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोपीय खरीदारों ने भारत से कपड़ों के ऑर्डर में 25% तक की कटौती की थी, और यार्न की कीमतें 2020 के बाद से दोगुनी हो गई थीं। उस समय क्रूड ऑयल (Crude Oil) 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जिससे कंज्यूमर स्पेंडिंग (Consumer Spending) पर असर पड़ा था।
हालांकि, यूके (UK) के साथ प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) जैसे कदम भारत को बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले बढ़त दिला सकते हैं, खासकर कुछ टेक्सटाइल गुड्स पर ड्यूटी-फ्री एक्सेस (Duty-free Access) मिलने से।
वित्तीय सेहत पर असर
अलग-अलग कंपनियों के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस में भी काफी अंतर है। उदाहरण के लिए, अरविंद लिमिटेड (Arvind Limited) का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो लगभग 24-27x है, जबकि रेमंड लिमिटेड (Raymond Ltd.) का P/E रेशियो 1x से भी काफी कम है, जो वित्तीय दबाव या अंडरवैल्यूएशन का संकेत हो सकता है। टेक्सटाइल मशीनरी बनाने वाली लक्ष्मी मशीन वर्क्स (Lakshmi Machine Works) का P/E रेशियो 125x से अधिक है।
एनालिस्ट्स (Analysts) का अनुमान है कि टैरिफ (Tariffs) और नीतिगत अनिश्चितता के कारण 2026 तक अमेरिका को होने वाले टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में 9-10% की गिरावट आ सकती है। अमेरिका भारत के कुल टेक्सटाइल शिपमेंट का लगभग 29% हिस्सा है। एक्सपोर्टर्स को ऑर्डर कैंसिलेशन (Order Cancellation) और मार्जिन प्रेशर (Margin Pressure) का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वे वॉल्यूम के बजाय प्रॉफिटेबिलिटी पर ध्यान दे रहे हैं। कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति इंडस्ट्री की संवेदनशीलता स्पष्ट है; 2022 की शुरुआत में ही कॉटन की कीमतें 20 दिनों में INR 78,000 से बढ़कर INR 83,000 प्रति कैंडी हो गई थीं।
भविष्य में, इनपुट लागतें शायद स्थिर हो जाएं, लेकिन एक्सपोर्ट जोखिम बने रहेंगे। भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री ग्लोबल डिमांड में अनिश्चितता का सामना कर रही है और मजबूत सप्लाई चेन की जरूरत है।