भारतीय टेलीकॉम कंपनियां अगले 3-4 महीनों में अपने टैरिफ में **12% से 15%** तक की बढ़ोतरी कर सकती हैं। इंडस्ट्री रिसर्च के मुताबिक, यह कदम तीन बड़ी कंपनियों के बीच मार्केट कंसॉलिडेशन के बाद उठाया जा रहा है, जिसका मकसद प्रति यूजर औसत रेवेन्यू (ARPU) को बढ़ाना है।
टैरिफ में बढ़ोतरी की वजह?
भारतीय टेलीकॉम सेक्टर एक बार फिर टैरिफ बढ़ाने की तैयारी में है। अनुमान है कि अगले तीन से चार महीनों में कीमतें 12% से 15% तक बढ़ सकती हैं। यह उम्मीद इसलिए भी जताई जा रही है क्योंकि मार्केट में अब केवल तीन बड़ी कंपनियां बची हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा कम हो गई है और कंपनियों के लिए कीमतें बढ़ाना आसान हो गया है।
ARPU पर क्या होगा असर?
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्रति यूजर औसत रेवेन्यू (ARPU) में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। जून तिमाही के लिए 1% से 1.5% तक की वृद्धि का अनुमान है। इसकी वजह है कि ज़्यादातर ग्राहक पुरानी टेक्नोलॉजी से 4G और 5G नेटवर्क की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे डेटा सेवाओं पर उनका खर्च बढ़ रहा है। साथ ही, प्री-पेड की जगह पोस्ट-पेड प्लान्स की ओर झुकाव भी कंपनियों के लिए ज़्यादा स्थिर और ऊंची कमाई का जरिया बन रहा है।
कॉम्पिटिशन और सब्सक्राइबर ग्रोथ
मार्केट में मुख्य रूप से Bharti Airtel और Reliance Jio का दबदबा बना हुआ है। इन दोनों कंपनियों के सब्सक्राइबर बेस में और इजाफा होने की उम्मीद है। अनुमान है कि Bharti Airtel के सब्सक्राइबर 50 लाख और Reliance Jio के 70 लाख तक बढ़ सकते हैं। वहीं, Vodafone Idea की ग्रोथ थोड़ी धीमी रहने की उम्मीद है, जिसके 2 लाख नए ग्राहक जुड़ने का अनुमान है।
Reliance Jio और Bharti Airtel अपने 5G नेटवर्क को 90% से ज़्यादा जिलों में फैला चुके हैं। Vodafone Idea भी अपने 5G नेटवर्क को करीब 100 शहरों तक पहुंचा चुका है। कंपनियां 5G फिक्स्ड वायरलेस एक्सेस और फिक्स्ड ब्रॉडबैंड जैसे नए सेगमेंट में भी अपनी सेवाएं बढ़ा रही हैं, जिनमें अभी मार्केट पेनिट्रेशन कम है लेकिन ग्रोथ की काफी संभावनाएं हैं।
फाइनेंशियल हेल्थ और रिस्क
निवेशकों के लिए इन कंपनियों की फाइनेंशियल हेल्थ पर नजर रखना ज़रूरी है, खासकर कर्ज और कैपिटल स्पेंडिंग के मामले में। Vodafone Idea ने अपने एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) ड्यूज को ₹25,000 करोड़ (प्रेजेंट वैल्यू) तक कम किया है, जिससे कंपनी को कुछ राहत मिली है। हालांकि, 5G इंफ्रास्ट्रक्चर और डिवाइस में भारी निवेश की वजह से कंपनियों पर कैपिटल स्पेंडिंग का दबाव बना हुआ है।
मुख्य रिस्क यह है कि लगातार टैरिफ हाइक के बीच ग्राहकों की डिमांड कितनी स्थिर रह पाती है। अगर कीमतें बहुत ज़्यादा बढ़ाई गईं, तो ग्राहक सस्ते प्लान की ओर जा सकते हैं या प्रीमियम सेवाओं को टाल सकते हैं। अब देखना यह होगा कि कंपनियां कब कीमतों में बढ़ोतरी का ऐलान करती हैं और ग्राहक इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
