Tata Communications के शेयरों में आज बिकवाली का दबाव दिखा, कंपनी के जून तिमाही के नतीजों के बाद स्टॉक **6%** तक गिर गया। कंपनी ने **29%** की गिरावट के साथ **₹230 करोड़** का नेट प्रॉफिट दर्ज किया है।
Detailed Coverage
नतीजों का असर: शेयर क्यों फिसले?
22 जुलाई को Tata Communications के शेयर 6% तक लुढ़क गए। इसकी मुख्य वजह कंपनी की पहली तिमाही (Q1 FY27) की कमाई के आंकड़े रहे। पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले कंपनी का नेट प्रॉफिट 29% घटकर ₹230 करोड़ रह गया। टॉप-लाइन में डबल-डिजिट ग्रोथ के बावजूद, इस मुनाफे में गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।
रेवेन्यू ग्रोथ जारी, पर लागत बढ़ी
ऑपरेशंस से रेवेन्यू में 10% की सालाना बढ़ोतरी देखी गई, जो कि पिछले साल की इसी तिमाही के ₹5,960 करोड़ की तुलना में बढ़कर ₹6,583 करोड़ हो गया। कंपनी का कहना है कि यह ग्रोथ उसके मुख्य कनेक्टिविटी सर्विसेज और डिजिटल पोर्टफोलियो की बदौलत हुई है। हालांकि, बढ़ी हुई लागतों का सीधा असर कंपनी के नेट प्रॉफिट पर पड़ा।
नई लेबर कोडिंग का एकमुश्त खर्च: ₹106 करोड़ का झटका
कंपनी के मुनाफे में गिरावट की एक बड़ी वजह ₹106 करोड़ का एकमुश्त (one-time) अकाउंटिंग चार्ज रहा। यह खर्च नवंबर 2025 में लागू हुए नए लेबर कोड के तहत ग्रेच्युटी और लंबी अवधि की लीव देनदारियों के एक्चुअरियल वैल्यूएशन के कारण हुआ। हालांकि यह खर्च दोहराया नहीं जाएगा, लेकिन इसने कंपनी की शॉर्ट-टर्म फाइनेंशियल्स पर असर डाला है।
मैनेजमेंट का भरोसा और आगे की रणनीति
MD और CEO गणेश लक्ष्मी नारायणन ने कहा कि नॉर्मलाइज्ड ऑपरेटिंग प्रॉफिट स्थिर है। कंपनी ने पूरे फाइनेंशियल ईयर के लिए अर्निंग्स बिफोर इंटरेस्ट, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमोर्टाइजेशन (EBITDA) में डबल-डिजिट ग्रोथ के अपने लक्ष्य को दोहराया है। कंपनी की रणनीतिक प्राथमिकताओं में नेटवर्क फैब्रिक बिजनेस को बढ़ाना, प्लेटफॉर्म रेवेन्यू में इजाफा करना और डिजिटल मार्जिन को बेहतर बनाना शामिल है। साथ ही, कंपनी EBITDA-टू-कैश कन्वर्जन को बेहतर बनाने पर भी ध्यान दे रही है, ताकि ऑपरेटिंग प्रॉफिट को असल कैश फ्लो में बदला जा सके।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
अब निवेशकों की नजर कंपनी की डिजिटल और नेटवर्क सर्विसेज सेगमेंट में ग्रोथ बनाए रखने की क्षमता पर होगी, साथ ही ऑपरेशनल खर्चों को कंट्रोल करने पर भी। इस तिमाही में एकमुश्त खर्चों के प्रभाव को देखते हुए, अगले सितंबर और दिसंबर की तिमाहियों में कोर ऑपरेटिंग मार्जिन के रुझान पर नजर रखना ज़रूरी होगा। इसके अलावा, यह देखना भी अहम होगा कि कंपनी का कैश कन्वर्जन पर फोकस आने वाले समय में बैलेंस शीट को मजबूत करने और कर्ज का दबाव कम करने में कितना कामयाब होता है।
