Bharti Airtel और Reliance Jio ने TRAI के उस नए प्रस्ताव का विरोध किया है, जिसमें 5G नेटवर्क कैपेसिटी को **80%** तक सीमित रखने की बात कही गई है। टेलिकॉम कंपनियों का कहना है कि यह नियम न केवल तकनीकी रूप से अव्यावहारिक है, बल्कि इससे लागत भी काफी बढ़ जाएगी।
विवाद की मुख्य वजह
TRAI का यह प्रस्ताव 5G नेटवर्क स्लाइसिंग (Network Slicing) के प्रबंधन से जुड़ा है। स्लाइसिंग के जरिए टेलिकॉम कंपनियां गेमिंग, स्ट्रीमिंग या इंडस्ट्रियल कामों के लिए अलग और कस्टमाइज्ड नेटवर्क चैनल बना सकती हैं। रेगुलेटर का मानना है कि 80% की लिमिट रखने से नेटवर्क पर कंजेशन नहीं होगा और ग्राहकों को बेहतर सर्विस मिलेगी, यानी उन्हें हमेशा 20% क्षमता खाली रखनी होगी।
कंपनियों का क्या तर्क है?
Bharti Airtel और Reliance Jio जैसे दिग्गजों का कहना है कि 5G टेक्नोलॉजी डायनामिक रिसोर्स मैनेजमेंट पर काम करती है। नेटवर्क कई बार 100% क्षमता पर भी बिना किसी रुकावट के चल सकते हैं क्योंकि ट्रैफिक ऑटोमैटिक तरीके से बैलेंस हो जाता है। कंपनियों के अनुसार, सरकार के इस 'हार्ड कैप' के कारण उन्हें फालतू इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना पड़ेगा, ताकि वे रेगुलेटरी मेट्रिक्स को पूरा कर सकें।
निवेशकों के लिए जोखिम
निवेशकों के नजरिए से यह सिर्फ तकनीकी विवाद नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मुनाफे से जुड़ी चिंता है। यदि यह नियम लागू होता है, तो टेलिकॉम कंपनियों को अपने IT सिस्टम और मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म्स को अपग्रेड करना होगा, जिसका सीधा असर उनके मार्जिन पर पड़ेगा। इसके अलावा, एंटरप्राइज क्लाइंट्स से मिलने वाले रेवेन्यू पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है।
नेट न्यूट्रलिटी का मुद्दा
इधर, कंज्यूमर एडवोकेसी ग्रुप्स इस बात से डरे हुए हैं कि कहीं टेलिकॉम कंपनियां नेटवर्क स्लाइसिंग का फायदा उठाकर चुनिंदा एप्स को 'पेड फास्ट लेन' (Paid Fast Lane) न देने लगें। रेगुलेटर अब इन सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना अंतिम फैसला लेगा, जिस पर बाजार की पैनी नजर बनी हुई है।
