टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) ने सैटेलाइट इंटरनेट के लिए एक नए SCNaaS मॉडल की सिफारिश की है। इसके तहत सैटेलाइट कंपनियों को सीधे ग्राहकों को सेवा बेचने के बजाय टेलीकॉम कंपनियों के साथ पार्टनरशिप करनी होगी। इस पर **8%** रेवेन्यू-बेस्ड फीस और सालाना स्पेक्ट्रम शुल्क का प्रस्ताव रखा गया है।
TRAI ने 5 नवंबर, 2026 को सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) के लिए एक नया ऑथोराइजेशन फ्रेमवर्क जारी किया है। इस प्रस्तावित मॉडल का मुख्य उद्देश्य देश में सैटेलाइट कनेक्टिविटी को आसान बनाना है।
बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव
इस नए ढांचे के तहत, सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाता अब सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और उसे मेंटेन करने का काम करेंगे। रेगुलेटर ने इन कंपनियों को सीधे ग्राहकों (End Users) को टेलीकॉम सर्विस बेचने से मना कर दिया है। इन्हें अपनी कैपेसिटी अब मौजूदा टेलीकॉम ऑपरेटर्स को लीज पर देनी होगी, जिससे मोबाइल कंपनियों का मार्केट शेयर सुरक्षित रहेगा और कीमतों में अनचाही प्रतिस्पर्धा नहीं होगी।
लाइसेंस और वित्तीय लागत
रेगुलेटर ने इन ऑथोराइजेशन को 20 साल की अवधि के लिए देने का सुझाव दिया है। निवेशकों को इन प्रमुख वित्तीय खर्चों पर नजर रखनी चाहिए:
- 8% एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) आधारित फीस।
- ₹3,500 प्रति MHz की दर से सालाना स्पेक्ट्रम चार्ज।
ये शुल्क हालांकि स्पष्टता लाते हैं, लेकिन ये कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकते हैं।
आगे की राह और जोखिम
इस नीति का मुख्य लक्ष्य डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना है, ताकि मोबाइल फोन आसानी से सैटेलाइट नेटवर्क से कनेक्ट हो सकें। हालांकि, अभी यह केवल एक सिफारिश है और सरकार द्वारा अंतिम अधिसूचना (Notification) आना बाकी है। निवेशकों को सैटेलाइट ऑपरेटरों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच होने वाली भविष्य की पार्टनरशिप पर नजर रखनी होगी, क्योंकि इस मॉडल की सफलता रेवेन्यू शेयरिंग एग्रीमेंट की व्यवहार्यता पर निर्भर करेगी।
