₹1 प्रति GB डेटा टैक्स पर घमासान: भारत के डिजिटल भविष्य पर बड़ा सवाल!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
₹1 प्रति GB डेटा टैक्स पर घमासान: भारत के डिजिटल भविष्य पर बड़ा सवाल!
Overview

भारत सरकार मोबाइल डेटा पर ₹1 प्रति गीगाबाइट (GB) की नई टैक्स दर लगाने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव का मकसद टेलीकॉम रेवेन्यू बढ़ाना और डिजिटल एडिक्शन को कम करना है, लेकिन इसके विरोध में डबल टैक्सेशन और डिजिटल एक्सेस पर असर की चिंताएं जताई जा रही हैं।

क्या है ₹1 प्रति GB डेटा टैक्स का प्रस्ताव?

सरकार की ओर से मोबाइल डेटा के हर गीगाबाइट (GB) पर ₹1 का टैक्स लगाने पर विचार किया जा रहा है। दूरसंचार विभाग (Department of Telecommunications) से सितंबर 2026 तक इसकी फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है। इस कदम का मकसद टेलीकॉम कंपनियों के रेवेन्यू को बढ़ाना और युवाओं में डिजिटल एडिक्शन (Digital Addiction) जैसी समस्याओं से निपटना है। अनुमान है कि अगर यह लागू होता है, तो FY25 में भारत के अनुमानित 229 अरब GB मोबाइल डेटा इस्तेमाल के आधार पर सालाना करीब ₹22,900 करोड़ का रेवेन्यू जनरेट हो सकता है।

डबल टैक्सेशन और डिजिटल ग्रोथ पर असर की चिंता

हालांकि, इस प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि मोबाइल रीचार्ज और सेवाओं पर पहले से ही 18% गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) लग रहा है। ऐसे में, डेटा पर नया टैक्स लगाना सीधे तौर पर डबल टैक्सेशन (Double Taxation) होगा, जो उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ाएगा।

यह प्रस्ताव सरकार के भारत को क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर का हब बनाने के लक्ष्य के विपरीत भी जाता दिख रहा है। सरकार विदेशी क्लाउड कंपनियों को भारतीय डेटा सेंटरों के इस्तेमाल पर 2047 तक टैक्स में छूट देकर $200 बिलियन से अधिक का निवेश आकर्षित करना चाहती है। डेटा को सस्ता बनाने के बजाय महंगा करने का यह कदम, इस बड़े लक्ष्य के साथ मेल नहीं खाता। दुनिया भर में, सरकारें आमतौर पर डिजिटल कंपनियों के प्रॉफिट पर टैक्स लगाती हैं, न कि एंड-यूजर्स (End-users) द्वारा डेटा की खपत पर, जिससे इस तरह के रिटेल डेटा टैक्स दुर्लभ हैं।

कानूनी और रेगुलेटरी सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के टैक्स प्लान में महत्वपूर्ण जोखिम हैं। डबल टैक्सेशन के अलावा, इसकी कानूनी वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं। व्यवहार संबंधी समस्याओं, जैसे माइनर्स में डिजिटल एडिक्शन, के लिए ब्रॉड टैक्स लगाना अनुचित माना जा रहा है। उनका सुझाव है कि इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट (Information Technology Act) में बताए गए उपाय, जैसे एज वेरिफिकेशन (Age Verification) और कंटेंट लिमिट्स (Content Limits), इस समस्या से निपटने के लिए बेहतर तरीके होंगे।

टेलीकॉम सेक्टर खुद वित्तीय दबाव में है, और सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI) जैसे संगठन पहले से ही रेगुलेटरी फीस और जीएसटी में राहत की मांग कर रहे हैं। एक नया, संभावित रूप से अस्थिर टैक्स इन वित्तीय दबावों को बढ़ा सकता है और पॉलिसी को लेकर भ्रम पैदा कर सकता है।

आगे की राह

दूरसंचार विभाग की सितंबर 2026 की रिपोर्ट इस प्रस्ताव के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगी। सरकार जहां नए रेवेन्यू सोर्स और डिजिटल प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग चाहती है, वहीं यह योजना डिजिटल इकॉनमी के लक्ष्यों से टकराती दिख रही है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि स्पेक्ट्रम यूसेज फीस और लाइसेंस फीस जैसी मौजूदा शुल्कों को सुव्यवस्थित करना रेवेन्यू बढ़ाने और सेक्टर को सपोर्ट करने का अधिक प्रभावी तरीका होगा। यदि डिजिटल एडिक्शन एक पब्लिक हेल्थ इशू है, तो संसद के पास इससे निपटने के लिए कानून हैं, जिससे ऐसे नए, शायद अप्रभावी, टैक्स की जरूरत नहीं है। इस स्टडी का नतीजा भारत के डिजिटल भविष्य पर असर डालेगा, जिसमें रेवेन्यू की जरूरत और सभी के लिए किफायती डिजिटल एक्सेस के लक्ष्य के बीच संतुलन बनाना होगा।

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