चीन का दबदबा क्यों बढ़ रहा है?
भारत का टेलीकॉम इंपोर्ट बिल लगातार बढ़ रहा है। Financial Year 2019-20 में यह $5.55 अरब था, जो 2023-24 में बढ़कर $6.37 अरब हो गया। वहीं, टेलीकॉम इंस्ट्रूमेंट्स का कुल आयात $13.33 अरब से बढ़कर $17.01 अरब तक पहुंच गया है। यह दिखाता है कि सरकारी पहलों के बावजूद, चीन के सप्लाई चेन (Supply Chain) और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट एडवांटेज (Manufacturing Cost Advantage) का दबदबा बना हुआ है।
सरकारी प्लान्स कितने कारगर?
सरकार ने 'पब्लिक प्रोक्योरमेंट ऑर्डर' (Public Procurement Order) और 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीम जैसी कई योजनाओं के जरिए डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग (Domestic Manufacturing) को बढ़ावा देने की कोशिश की है। PLI स्कीम के तहत टेलीकॉम और नेटवर्किंग प्रोडक्ट्स के लिए ₹4,646 करोड़ से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट आया है और 44,000 से ज्यादा जॉब्स (Jobs) पैदा होने की उम्मीद है। टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन को आसान बनाने के कदम भी उठाए गए हैं। लेकिन, आयात के बढ़ते आंकड़े बताते हैं कि ये उपाय अभी चीनी सप्लायर्स को पूरी तरह से बाहर करने या ग्लोबल सप्लाई चेन को बदलने में काफी नहीं हैं।
बढ़ता ट्रेड डेफिसिट और बड़ी कंपनियाँ
चीन के साथ भारत का कुल ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) FY24 में $85.06 अरब तक पहुंच गया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स इंपोर्ट का बड़ा हाथ है। जबकि भारत 2026 तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर बनने का लक्ष्य रख रहा है, वैल्यू एडिशन (Value Addition) के मामले में वह चीन से काफी पीछे है। भारत की प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में Dixon Technologies का पिछले फाइनेंशियल ईयर में रेवेन्यू (Revenue) ₹3,88,601 करोड़ रहा, जबकि Lava International ने FY24 में ₹3,670 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया (हालांकि इसका रेवेन्यू CAGR पिछले साल -26% था)।
ग्लोबल मार्केट और जियोपॉलिटिकल फैक्टर्स
5G अडॉप्शन (5G Adoption) और IoT (Internet of Things) के बढ़ते इस्तेमाल से ग्लोबल टेलीकॉम इक्विपमेंट मार्केट तेज हो रहा है, जिसमें Huawei जैसी कंपनियां बड़ा हिस्सा रखती हैं। चीन का मैन्युफैक्चरिंग डोमिनेंस इस ग्लोबल मार्केट की रीढ़ है। बदलते ट्रेड पॉलिसी और अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड टेंशन (Trade Tension) में नरमी जैसे जियोपॉलिटिकल फैक्टर्स (Geopolitical Factors) भी भारत के कॉस्ट एडवांटेज और एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस (Export Competitiveness) को प्रभावित कर सकते हैं।
'मेक इन इंडिया' के लिए जोखिम
मजबूत पॉलिसी और PLI इन्वेस्टमेंट के बावजूद, इंपोर्ट पर निर्भरता भारत की एक बड़ी कमजोरी बनी हुई है। यह भारत को सप्लाई चेन में रुकावटों और जियोपॉलिटिकल दबाव के प्रति संवेदनशील बनाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकॉम प्रोडक्ट्स के लिए लोकल कंटेंट (Local Content) के नियमों को आसान बनाने के प्रस्ताव, सीमित कंपोनेंट इकोसिस्टम (Component Ecosystem) के कारण जरूरतों को पूरा करने में आ रही चुनौतियों को देखते हुए, चिंता पैदा करते हैं कि भारत एक फुल इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग बेस (Integrated Manufacturing Base) बनने के बजाय सिर्फ एक असेंबली हब (Assembly Hub) बनकर रह सकता है। इससे 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य कमजोर पड़ सकते हैं। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में वैल्यू एडिशन अभी 18% से कम अनुमानित है।
आगे का रास्ता: ग्रोथ और इंपोर्ट में संतुलन
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग मार्केट 2032 तक $197.8 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। हालिया रिपोर्ट्स में टेलीकॉम एक्सपोर्ट में भी 72% की जोरदार ग्रोथ (जो $2.03 अरब तक पहुंच गई) देखी गई है। लेकिन, टेलीकॉम इक्विपमेंट के लिए चीनी इंपोर्ट पर लगातार निर्भरता एक बड़ी चुनौती है। भविष्य सरकार की क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह डोमेस्टिक कंपोनेंट इकोसिस्टम को कैसे मजबूत करती है, वैल्यू एडिशन को कैसे बढ़ाती है, और स्थापित ग्लोबल सप्लाई चेन के मुकाबले डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बेहतर समर्थन देने के लिए ट्रेड पॉलिसी को कैसे एडजस्ट करती है।