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भारत में ब्रॉडबैंड की कमी: Mobile का बोलबाला, Digital Future पर मंडराता खतरा!

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत में ब्रॉडबैंड की कमी: Mobile का बोलबाला, Digital Future पर मंडराता खतरा!
Overview

भारत की डिजिटल इकॉनमी Mobile Internet के दम पर तेजी से बढ़ रही है, लेकिन एक बड़ी चुनौती सिर पर खड़ी है। देश में Fixed Broadband का इस्तेमाल बेहद कम है, जो **2.75%** के आसपास ही सिमटा हुआ है। यह Mobile-First अप्रोच भविष्य में नेटवर्क पर दबाव बढ़ा सकती है और डिजिटल ग्रोथ को धीमा कर सकती है।

Mobile First: डिजिटल ग्रोथ का मजबूत सहारा, पर बन रही है कमजोरी?

भारत दुनिया का डिजिटल पावरहाउस है, जहां Mobile Data का इस्तेमाल आसमान छू रहा है और 5G का रोलआउट भी तेजी से हो रहा है। इसकी एक बड़ी वजह है 'Mobile-First' ब्रॉडबैंड रणनीति, जिसने करोड़ों लोगों को इंटरनेट से जोड़ा है। मगर, इसी रणनीति ने एक बड़ी असंतुलन पैदा कर दी है। दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले, जहां डिजिटल इकॉनमी मजबूत Fixed Network पर टिकी है, भारत में Fixed Broadband की पैठ सिर्फ 2.75% है।

ग्लोबल स्टैंडर्ड्स से भारत कितना पीछे?

जब बात मजबूत डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने की आती है, तो दुनिया के दूसरे देश अलग राह पर हैं। फ्रांस, यूके, जापान और अमेरिका जैसे देशों में Fixed Broadband की पैठ 35% से ऊपर है, जहां फाइबर ऑप्टिक्स आम है। चीन ने भी 5G के साथ-साथ अपने फाइबर नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया है। भारत में Mobile Data करीब ₹10 प्रति GB मिलता है, वहीं Fixed Broadband इससे कहीं सस्ता, यानी ₹1-2 प्रति GB है। ऐसे में, बड़े पैमाने पर डिजिटल गतिविधियों और समावेशन के लिए सस्ते Fixed Broadband की जरूरत और बढ़ जाती है। सरकार की BharatNet जैसी परियोजनाएं गांवों को जोड़ने और फाइबर बिछाने का काम कर रही हैं। मार्च 2025 तक, देश भर में करीब 700,000 किलोमीटर फाइबर केबल बिछाए जा चुके हैं, और आगे भी इसका विस्तार जारी रहेगा। ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम का अनुमान है कि अन्य डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं के बराबर पहुंचने के लिए भारत को Fixed Broadband में दस गुना वृद्धि की जरूरत है। रिसर्च बताती है कि ब्रॉडबैंड के इस्तेमाल और आर्थिक विकास के बीच सीधा संबंध है; इंटरनेट यूजर्स में 10% की वृद्धि राज्य के GDP को 1.08% तक बढ़ा सकती है।

Mobile पर ज्यादा निर्भरता: नेटवर्क पर बोझ और भविष्य के जोखिम

माना जा रहा है कि 2025 के अंत तक भारत में ब्रॉडबैंड यूजर्स की संख्या 1 अरब को पार कर जाएगी, लेकिन Mobile Access पर यह भारी निर्भरता कमजोरियां पैदा कर रही है। Mobile नेटवर्क स्पेक्ट्रम की कमी से जूझते हैं और इनकी कनेक्टिविटी घरों और व्यवसायों की हाई, स्टेबल डिमांड के लिए कम भरोसेमंद है। इससे नेटवर्क कंजेशन (भीड़) और परफॉर्मेंस में गिरावट आ सकती है, जो मैन्युफैक्चरिंग, टेलीमेडिसिन और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे उद्योगों की प्रोडक्टिविटी को नुकसान पहुंचा सकती है।

फाइबर ऑप्टिक्स हाई बैंडविड्थ, लो लेटेंसी और भरोसेमंद कनेक्टिविटी देता है, जिसे Mobile नेटवर्क एडवांस्ड एप्लीकेशन्स के लिए नहीं दे सकते। जहां भारत सस्ता Mobile Data ( $0.10 प्रति GB से कम) देने में अव्वल है, वहीं यह अंदरूनी इंफ्रास्ट्रक्चर गैप को छुपाता है। दुनिया भर में कुल ब्रॉडबैंड ट्रैफिक का सिर्फ पांचवां हिस्सा ही Mobile नेटवर्क पर आता है, जबकि Fixed Lines बाकी का ट्रैफिक संभालती हैं। यह असंतुलन भारत के डिजिटल इकोसिस्टम को स्पेक्ट्रम या पावर आउटेज जैसी रुकावटों के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाता है, जो देश की लंबी अवधि की डिजिटल ग्रोथ और प्रतिस्पर्धी स्थिति को प्रभावित कर सकता है।

भविष्य की ग्रोथ फाइबर नेटवर्क के विस्तार पर टिकी है

भारत का ब्रॉडबैंड मार्केट अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां संतुलन की सख्त जरूरत है। 2030 तक Fixed Broadband यूजर्स की संख्या 10 करोड़ तक पहुंच सकती है, जिसमें 12.6% की सालाना वृद्धि दर की उम्मीद है। इस ग्रोथ में फाइबर ऑप्टिक्स का बड़ा योगदान होगा, जो 2027 तक 85% से ज्यादा ब्रॉडबैंड लाइनों का हिस्सा बन जाएंगे। एनालिस्ट्स का मानना है कि बढ़ती इंटरनेट डिमांड को पूरा करने के लिए फाइबर नेटवर्क, होम ब्रॉडबैंड और फिक्स्ड वायरलेस एक्सेस (FWA) में लगातार निवेश जारी रहेगा। सरकार का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर और प्राइवेट सेक्टर का फाइबर में निवेश, इस बात का संकेत देता है कि भारत की निरंतर डिजिटल और आर्थिक प्रगति के लिए एक मजबूत Fixed Broadband बेस कितना जरूरी है।

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