टेलीकॉम कंपनियां और बैंक आपस में भिड़े, SMS कंट्रोल पर छिड़ी जंग!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
टेलीकॉम कंपनियां और बैंक आपस में भिड़े, SMS कंट्रोल पर छिड़ी जंग!

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भारत की दिग्गज टेलीकॉम कंपनियां और बैंक, कमर्शियल कॉल्स और SMS के लिए डिजिटल कंसेंट (Digital Consent) के कंट्रोल और लागत को लेकर आमने-सामने हैं। टेलीकॉम कंपनियां स्पैम रोकने के लिए एक्सक्लूसिव कंट्रोल चाहती हैं, वहीं बिजनेस का डर है कि लागत बढ़ेगी और कॉम्पीटिशन कम होगा। अब TRAI इस रेगुलेटरी डिस्प्यूट (Regulatory Dispute) में मध्यस्थता कर रही है।

क्या हुआ?

भारत की लीडिंग टेलीकॉम ऑपरेटर्स – भारती एयरटेल (Bharti Airtel), रिलायंस जियो (Reliance Jio) और वोडाफोन आइडिया (Vodafone Idea) – और बैंकों व अन्य बिजनेस के एक कंसोर्टियम (Consortium) के बीच एक बड़ा मतभेद सामने आया है। यह टकराव इस बात पर है कि कमर्शियल कम्युनिकेशन जैसे मार्केटिंग कॉल्स और प्रमोशनल SMS भेजने से पहले मोबाइल यूजर्स से ली जाने वाली जरूरी परमिशन, यानी 'डिजिटल कंसेंट' (Digital Consent) को मैनेज करने और चार्ज करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए।

टेलीकॉम ऑपरेटर्स इन कंसेंट मैंडेट्स (Consent Mandates) को ओन (Own) और मैनेज करने का एक्सक्लूसिव अधिकार मांग रहे हैं। उनका तर्क है कि सबसे ज्यादा मोबाइल सब्सक्राइबर्स तक सीधी पहुंच होने के कारण, वे ही एक सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल रजिस्ट्री बनाए रखने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में हैं। दूसरी ओर, बैंक और विभिन्न बिजनेस, जो बल्क मैसेजिंग (Bulk Messaging) और कस्टमर अलर्ट पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं, इसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि कुछ बड़ी टेलीकॉम कंपनियों को इतना पावर देने से कॉम्पीटिशन (Competition) पर असर पड़ेगा और उन बिजनेस के लिए ऑपरेशनल लागत (Operational Costs) बढ़ जाएगी जिन्हें अपने कस्टमर्स से कम्युनिकेट करने की जरूरत है।

स्पैम कंट्रोल कीPush

इस टकराव की जड़ अनचाहे कमर्शियल कम्युनिकेशन या 'स्पैम' (Spam) के खिलाफ चल रही लड़ाई में है। टेलीकॉम ऑपरेटर्स ने छोटे लाइसेंस प्राप्त टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स (Telecom Service Providers) जैसे क्वाड्रंट टेलीवेंचर्स (Quadrant Televentures) और एसटीपीएल (STPL) को लेकर गहरी चिंता जताई है। बड़े टेलीकॉम का आरोप है कि ये छोटी कंपनियां स्पैम की समस्या में काफी योगदान करती हैं और अक्सर बल्क कमर्शियल ट्रैफिक के लिए 'रिक्स-फ्री ओरिजिनेटर्स' (Risk-free Originators) के रूप में काम करती हैं।

भारती एयरटेल ने हाल ही में टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) को बताया था कि ब्लैकलिस्टेड एंटिटीज (Blacklisted Entities) और स्पैम कंप्लेट्स (Spam Complaints) का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं स्पेसिफिक नेटवर्क्स से जुड़ा हुआ था। कंसेंट पर एक्सक्लूसिव कंट्रोल के लिए पुश करके, बड़े टेलीकॉम ऑपरेटर्स इन मैसेजेस को ट्रैक और वेरिफाई करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) को सेंट्रलाइज (Centralize) करना चाहते हैं। उनका तर्क है कि इससे एंटी-स्पैम मेजर्स (Anti-spam Measures) को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा और जवाबदेही (Accountability) बढ़ेगी।

बैंक और बिजनेस क्यों चिंतित हैं?

बैंकों और बड़े बिजनेस के लिए, ट्रांजैक्शन अलर्ट (Transaction Alerts), ओटीपी (OTPs) और प्रमोशनल ऑफर्स भेजना रोजमर्रा के कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है। इन एंटिटीज को डर है कि अगर टेलीकॉम ऑपरेटर्स के हाथ में कंसेंट फ्रेमवर्क (Consent Framework) का पूरा कंट्रोल आ गया, तो यह एक मोनोपॉली (Monopoly) जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी चिंताएं हैं कि टेलीकॉम ऑपरेटर्स एकतरफा फीस बढ़ा सकते हैं या बिजनेस द्वारा कस्टमर कंसेंट को कलेक्ट और मैनेज करने के तरीकों पर प्रतिबंध लगा सकते हैं।

ये बिजनेस तर्क देते हैं कि लागत को कॉम्पिटिटिव बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी कस्टमर्स तक पहुंचने की क्षमता टेलीकॉम कंपनियों द्वारा अनुचित रूप से सीमित न हो, कंसेंट मैनेजमेंट के लिए एक डायवर्स (Diverse) और ओपन इकोसिस्टम (Open Ecosystem) जरूरी है। इन कम्युनिकेशन चैनल्स का उपयोग करने के लिए उच्च शुल्कों की संभावना बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर के लिए एक प्राथमिक चिंता का विषय बनी हुई है।

रेगुलेटरी कॉन्टेक्स्ट (Regulatory Context)

TRAI, कमर्शियल कम्युनिकेशन के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (Regulatory Framework) को मजबूत करने पर काम कर रहा है, खासकर डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (Distributed Ledger Technology - DLT) के कार्यान्वयन के माध्यम से। यह ब्लॉकचेन-आधारित सिस्टम कंसेंट का एक पारदर्शी, अपरिवर्तनीय रिकॉर्ड बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे यह वेरिफाई करना आसान हो जाता है कि किसी कस्टमर ने वास्तव में मार्केटिंग मैसेज प्राप्त करने की सहमति दी है या नहीं।

हालांकि लक्ष्य उपभोक्ताओं को अनचाहे स्पैम से बचाना है, वर्तमान विवाद इस फ्रेमवर्क को लागू करने की ऑपरेशनल चुनौतियों को उजागर करता है। TRAI अब टेलीकॉम ऑपरेटर्स की सिक्योर, यूनिफाइड स्पैम-कंट्रोल मैकेनिज्म (Spam-control Mechanism) की मांग और बिजनेस सेक्टर की सस्ती, खुली और कॉम्पिटिटिव कम्युनिकेशन लैंडस्केप (Communication Landscape) की जरूरत के बीच संतुलन बनाने की मुश्किल स्थिति में है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

निवेशकों को TRAI द्वारा जारी की जाने वाली अंतिम दिशा या नीति दिशानिर्देशों (Policy Guidelines) पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इससे उन व्यवसायों के लिए भविष्य की लागत संरचना (Cost Structure) तय होगी जो बल्क SMS और कॉल्स पर निर्भर हैं। इस समाधान से पता चलेगा कि रेगुलेटरी एनवायरनमेंट (Regulatory Environment) टेलीकॉम दिग्गजों द्वाराFavored एक सेंट्रलाइज्ड मॉडल (Centralized Model) की ओर बढ़ेगा या बैंकों द्वारा समर्थित एक अधिक डिस्ट्रिब्यूटेड मॉडल (Distributed Model) की ओर। इसके अतिरिक्त, कमर्शियल कम्युनिकेशन के लिए शुल्क संरचना में कोई भी बदलाव दोनों टेलीकॉम कंपनियों और इन हाई-वॉल्यूम कम्युनिकेशन चैनल्स में शामिल व्यावसायिक संस्थाओं के रेवेन्यू मार्जिन (Revenue Margins) को प्रभावित कर सकता है।

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