भारत अपनी टेलीकॉम पॉलिसी में बड़ा बदलाव कर रहा है, जिसके तहत अब सिर्फ असेंबली पर नहीं बल्कि कंपोनेंट-लेवल की मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस किया जाएगा। 2021 की PLI स्कीम के अधूरे परिणामों को देखते हुए सरकार अब नई रणनीति तैयार कर रही है, जो India Mobile Congress 2026 से पहले निवेशकों के लिए अहम है।
मैन्युफैक्चरिंग का बदलता स्वरूप
भारत सरकार अब टेलीकॉम सेक्टर में असेंबली (Assembly) से आगे बढ़कर डीप-कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। आगामी India Mobile Congress (IMC) 2026 (जो 8 अक्टूबर से शुरू हो रहा है) से पहले, नीति निर्माता एक ऐसे वैल्यू चेन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं जो केवल फिनिश्ड प्रोडक्ट तक सीमित न रहे। इस नई रणनीति का मुख्य लक्ष्य ऑप्टिकल सब-असेंबली, रेडियो फ्रीक्वेंसी एम्पलीफायर और सेमीकंडक्टर जैसे क्रिटिकल कंपोनेंट्स का देश में ही निर्माण करना है।
PLI स्कीम की चुनौतियां
2021 में लॉन्च हुई प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के नतीजे मिले-जुले रहे हैं। आंकड़ों पर गौर करें, तो अब तक ₹12,195 करोड़ के कुल बजट आवंटन में से केवल 15% राशि ही कंपनियों को मिल पाई है। इसकी मुख्य वजह कड़े निवेश और सेल्स के नियम रहे, जिन्हें पूरा करना कई कंपनियों के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ। बी-टू-बी (B2B) मार्केट की अनिश्चितता और पुराने बड़े वेंडर्स का दबदबा भी छोटी भारतीय कंपनियों के लिए बड़ी बाधा रहा है।
निवेशकों के लिए जोखिम और संकेत
छोटे मैन्युफैक्चरर्स और MSMEs के लिए सरकार अब एक अधिक लचीला फ्रेमवर्क तैयार करने की तैयारी में है। हालांकि, निवेशकों को यह समझना होगा कि फाइनल असेंबली से कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ना एक 'कैपिटल-इंटेंसिव' (Capital Intensive) सफर है, जिसमें रिसर्च और डेवलपमेंट पर भारी खर्च होता है और मुनाफा आने में समय लगता है।
इसके अलावा, TRAI के हालिया 'Telecom Consumer Protection (Thirteenth Amendment) Regulations, 2026' के चलते मार्केट सेंटीमेंट पर असर दिख रहा है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार अपडेटेड इंसेंटिव फ्रेमवर्क में छोटे खिलाड़ियों के लिए क्या खास रियायतें देती है। जब तक कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आता, तब तक कंपनियों के कैश फ्लो और प्रॉफिटेबिलिटी पर नजर रखना ही समझदारी है।
