GSMA के डायरेक्टर जनरल विवेक बद्रीनाथ ने भारत में '5G नेटवर्क स्लाइसिंग' को बढ़ावा देने की वकालत की है। इस तकनीक का उद्देश्य टेलीकॉम कंपनियों को बेसिक डेटा प्लान से आगे ले जाकर रेवेन्यू बढ़ाने में मदद करना है। हालांकि, इसे TRAI की ओर से नेट न्यूट्रलिटी और सर्विस क्वालिटी को लेकर कड़ी रेगुलेटरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
मुनाफे का नया जरिया क्या है?
इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 में GSMA ने साफ किया है कि भारत में 450 मिलियन से अधिक 5G कनेक्शन होने के बावजूद, टेलीकॉम कंपनियां अब भी लो ARPU (एवरेज रेवेन्यू पर यूजर) की समस्या से जूझ रही हैं। नेटवर्क स्लाइसिंग के जरिए कंपनियां एक ही फिजिकल नेटवर्क को कई वर्चुअल सेगमेंट में बांट सकती हैं। इससे वे गेमिंग, रियल-टाइम डेटा और इमरजेंसी सर्विसेज के लिए 'प्रीमियम स्लाइस' बेच सकेंगी।
कंपनियों की रणनीति
Bharti Airtel, Reliance Jio और Vodafone Idea जैसी कंपनियां इस तकनीक के जरिए उन उद्योगों को टारगेट कर सकती हैं, जिन्हें मिशन-क्रिटिकल कनेक्टिविटी की जरूरत है। Bharti Airtel पहले ही 'Fast Lane' सर्विस के जरिए इसका प्रयोग कर चुकी है, जो पोस्टपेड यूजर्स को प्राथमिकता देती है।
चुनौतियां और रेगुलेटरी पेंच
हालांकि, इस मॉडल के सामने TRAI की कड़ी शर्तें आड़े आ रही हैं। रेगुलेटर को चिंता है कि प्रीमियम 'फास्ट लेन' बनाने से आम जनता की इंटरनेट स्पीड प्रभावित हो सकती है। TRAI के ड्राफ्ट नियमों के मुताबिक, ऑपरेटरों को 80% कैपेसिटी यूटिलाइजेशन लिमिट का पालन करना होगा और किसी भी बदलाव की सूचना पहले देनी होगी।
नेट न्यूट्रलिटी का मुद्दा भी निवेशकों के लिए अहम है। अगर ऑपरेटर डेटा को प्राथमिकता देने के लिए पैसे वसूलते हैं, तो यह भेदभावपूर्ण हो सकता है। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या TRAI कंपनियों को इनोवेशन की छूट देगा या सख्त नियमों में उन्हें बांध कर रखेगा।
