Cellular Operators Association of India (COAI) ने Department of Telecommunications (DoT) से 6 GHz बैंड के लिए **36 dBm** पावर लेवल की मांग की है। इससे रूरल इलाकों में सस्ती फिक्स्ड वायरलेस ब्रॉडबैंड सेवा देना आसान हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
COAI ने DoT के सामने औपचारिक रूप से मांग रखी है कि 6 GHz फ्रीक्वेंसी बैंड में 36 dBm की स्टैंडर्ड पावर लिमिट की अनुमति दी जाए। यह प्रस्ताव IIT मद्रास की एक एक्सपर्ट कमिटी की रिसर्च पर आधारित है, जिसका नेतृत्व प्रोफेसर राधा कृष्ण गंटी ने किया था। इसका मुख्य मकसद 5925-6425 MHz रेंज में स्पेक्ट्रम का बेहतर और ज्यादा कुशल इस्तेमाल करना है।
Fixed Wireless Access (FWA) पर असर
टेलिकॉम सेक्टर के निवेशकों के लिए यह खबर काफी अहम है, क्योंकि यह फिक्स्ड वायरलेस एक्सेस (FWA) की रणनीति से जुड़ी है। दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में घर-घर तक फाइबर केबल बिछाना बेहद महंगा और वक्त लेने वाला काम है। FWA के जरिए कंपनियां बिना भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर के वायरलेस सिग्नल से हाई-स्पीड इंटरनेट दे सकती हैं। अगर DoT इसे मंजूरी देती है, तो Reliance Industries (Jio) और Bharti Airtel जैसी बड़ी कंपनियों को बिना ज्यादा कैपिटल एक्सपेंडिचर किए अपना ब्रॉडबैंड बेस बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी।
स्पेक्ट्रम के लिए जंग
6 GHz बैंड को लेकर इंडस्ट्री दो गुटों में बंटी है। एक तरफ टेलिकॉम कंपनियां हैं जो इसे मोबाइल और वायरलेस नेटवर्क के लिए चाहती हैं, वहीं दूसरी तरफ टेक कंपनियां और Wi-Fi इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स हैं। इनका तर्क है कि इस बैंड को Wi-Fi 6E और Wi-Fi 7 जैसे एप्लीकेशंस के लिए अनलाइसेंस्ड (Unlicensed) रखना चाहिए।
निवेशकों के लिए क्या है ट्रैक करने वाली बात?
निवेशकों को अब सरकार के अगले कदम पर नजर रखनी चाहिए। अगर सरकार टेलिकॉम ऑपरेटरों के पक्ष में फैसला लेती है, तो यह उनके लिए बड़ा पॉजिटिव होगा। वहीं, अगर मौजूदा स्टेटस-quo बना रहता है, तो टेलिकॉम कंपनियों को पुराने बैंड्स या महंगी फाइबर तकनीक पर ही निर्भर रहना होगा। DoT का आने वाला फैसला ब्रॉडबैंड मार्केट की प्रतिस्पर्धा और कंपनियों की भविष्य की ग्रोथ को तय करेगा।
