Bharti Airtel ने सरकार से मांग की है कि सैटेलाइट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी के जरिए ही होना चाहिए। कंपनी का तर्क है कि इसे पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क के समान 'लेवल प्लेइंग फील्ड' मिलना चाहिए।
नियम और प्रतिस्पर्धा का गणित
टेलीकॉम सेक्टर में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को आवंटित करने का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है। जहाँ पारंपरिक मोबाइल ऑपरेटर पारदर्शिता के लिए नीलामी का समर्थन करते रहे हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट कंपनियां प्रशासनिक आवंटन की वकालत कर रही हैं। डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन ने सितंबर 2026 में Telecom Regulatory Authority of India (TRAI) की सिफारिशों पर कदम बढ़ाया है, जो भविष्य में इन संसाधनों के वितरण की दिशा तय करेगा।
सरकारी अधिकारियों ने साफ किया है कि वर्तमान मूल्यांकन प्रक्रिया भेदभाव रहित है। इसका मतलब है कि Bharti Airtel की खुद की सैटेलाइट इकाई, Eutelsat OneWeb, भी उसी सुरक्षा जांच और नियामक प्रक्रिया से गुजर रही है, जिससे उसके प्रतिस्पर्धी जैसे Starlink और Reliance Jio गुजर रहे हैं। कंपनी लीडरशिप ने उन दावों को खारिज किया है जिनमें कहा जा रहा था कि वे प्रतियोगिता को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए वित्तीय चुनौतियां
यह स्थिति सैटेलाइट सेक्टर में निवेश की भारी जरूरतों को दर्शाती है। Bharti Airtel अपनी 5G मोनेटाइजेशन रणनीति और नई डिजिटल सेवाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। कंपनी पर पहले से ही काफी कर्ज है, और इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार होने वाला बड़ा कैपिटल एक्सपेंडिचर निवेशकों के लिए एक चिंता का विषय है।
बाजार की नजर अब स्पेक्ट्रम की कीमत और आवंटन के अंतिम सरकारी फैसलों पर टिकी है। इन नियमों का सीधा असर कंपनी की उन सैटेलाइट सेवाओं की प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ेगा, जिन्हें वह भारत में लॉन्च करने की तैयारी कर रही है।
