AI Power Bill: अमेरिका में डेटा सेंटर्स पर बढ़ेगा बिजली का खर्च, टेक कंपनियों के मार्जिन पर संकट?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
AI Power Bill: अमेरिका में डेटा सेंटर्स पर बढ़ेगा बिजली का खर्च, टेक कंपनियों के मार्जिन पर संकट?

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump अब 'Ratepayer Protection Act' को सीनेट से मंजूरी दिलाने में जुटे हैं। इस बिल का मकसद बड़े डेटा सेंटर्स के लिए ग्रिड अपग्रेड का खर्च खुद उनसे वसूलना है, ताकि आम नागरिकों पर बिजली के बढ़ते दामों का बोझ न पड़े।

बिल का मुख्य मकसद

अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 417-3 के भारी बहुमत से पास होने के बाद अब यह बिल सीनेट में चर्चा का केंद्र है। राष्ट्रपति Donald Trump और सीनेट मेजॉरिटी लीडर John Thune इस पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य AI डेटा सेंटर्स की वजह से बढ़ रही बिजली की मांग और ग्रिड अपग्रेड के भारी-भरकम खर्च को आम घरों के बिजली बिल से अलग रखना है।

टेक कंपनियों और यूटिलिटी सेक्टर पर असर

अब तक डेटा सेंटर्स के लिए ग्रिड के विस्तार का खर्च सभी उपभोक्ताओं में बांट दिया जाता था। यदि यह कानून लागू होता है, तो राज्य के यूटिलिटी रेगुलेटर्स को यह तय करना होगा कि क्या इन बड़े डेटा सेंटर्स को इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्च का बोझ अकेले उठाना चाहिए।

निवेशकों की नजर इस बात पर है कि इससे बड़ी टेक कंपनियों के ऑपरेटिंग एक्सपेंस (OpEx) में कितनी बढ़ोतरी होगी। हालांकि बड़ी कंपनियों के पास कैश की कमी नहीं है, लेकिन AI ऑपरेशंस के लिए बिजली एक बुनियादी इनपुट है, जिसकी कीमतों में उछाल सीधे उनके प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है। वहीं, दूसरी ओर यूटिलिटी कंपनियों के लिए यह राहत की बात हो सकती है, क्योंकि उन्हें अब खर्चों की भरपाई के लिए जनता पर रेट हाइक का दबाव नहीं डालना पड़ेगा।

सीनेट में राह आसान नहीं

हालांकि हाउस में इसे बड़ी जीत मिली है, लेकिन सीनेट में राह इतनी आसान नहीं दिख रही। हाल ही में सीनेटर Martin Heinrich ने इस बिल को तेजी से आगे बढ़ाने की प्रक्रिया (unanimous consent) को ब्लॉक कर दिया। आलोचकों का मानना है कि बिल में अब भी कड़े प्रवर्तन तंत्र (enforcement mechanism) की कमी है। आने वाले दिनों में टेक लॉबिइंग और बिल की भाषा में होने वाले बदलाव बाजार की दिशा तय करेंगे।

भारत के लिए सबक

भारत में भी Reliance और Adani जैसे बड़े ग्रुप्स डेटा सेंटर के विस्तार में जुटे हैं। अमेरिका का यह कदम भविष्य में दुनिया भर के रेगुलेटर्स के लिए एक 'केस स्टडी' बन सकता है। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो भारत समेत अन्य देशों में भी औद्योगिक बिजली दरों और इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग के नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.