अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने विवादास्पद **$1,00,000** H-1B वीजा फीस पर रोक लगा दी है। इस फैसले से भारतीय आईटी कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, हालांकि भविष्य में पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता अभी भी बरकरार है।
भारतीय आईटी सर्विस कंपनियों को एक बहुत बड़ी राहत मिली है। अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उस प्रस्तावित $1,00,000 की H-1B वीजा एप्लिकेशन फीस को ब्लॉक कर दिया है, जिसे लेकर आईटी जगत में हड़कंप मचा था। कैलिफोर्निया और मैसाचुसेट्स की अदालतों ने साफ किया है कि इस भारी-भरकम लेवी (Levy) को लागू करने के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था। यह फैसला भारतीय आईटी दिग्गजों के लिए एक संजीवनी की तरह है, क्योंकि इससे कंपनियों के ऑपरेशनल कॉस्ट में होने वाला अचानक इजाफा टल गया है।
मार्जिन पर दबाव का डर टला
भारतीय आईटी सेक्टर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार से हासिल करता है। अगर यह $1,00,000 की फीस लागू हो जाती, तो कंपनियों के मार्जिन पर गहरा दबाव पड़ना तय था। अब Tata Consultancy Services, Infosys, Wipro और HCL Technologies जैसी बड़ी कंपनियों को अपना डिलीवरी मॉडल बिना किसी बड़े खर्च के जारी रखने की आजादी मिल गई है। निवेशक वीजा से जुड़ी इन लागतों पर कड़ी नजर रखते हैं क्योंकि ये सीधे तौर पर कंपनी के प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) को प्रभावित करती हैं।
अभी भी सावधान रहने की जरूरत
अदालत का यह फैसला तात्कालिक राहत तो है, लेकिन अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी से जुड़ी चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। प्रशासन इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकता है या नए नियमों के जरिए फिर से ऐसी पाबंदियां ला सकता है। वॉशिंगटन में भी वीजा नियमों को सख्त करने को लेकर चर्चाएं चलती रहती हैं। इन खतरों को देखते हुए भारतीय कंपनियां अब लोकल हायरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर अधिक फोकस कर रही हैं ताकि वीजा पर निर्भरता कम की जा सके। भविष्य में कैपिटल हिल (Capitol Hill) से आने वाली खबरें और नए एडमिनिस्ट्रेटिव नियम निवेशकों के लिए सबसे जरूरी मॉनिटरेबल (Monitorable) बने रहेंगे।
